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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

ग़ज़ल

ग़ज़ल

कितनी बेचैनी को दिल में दबा रखा है।
मैंने  भी  इक  ख़ाब सजा रखा है।

वो शरमाते बहोत हैं पर हम जानते हैं,
निगाहों ज़हन में हमें बसा रखा है।

कब वो आजाएँ क्या पता किस घड़ी,
घर  का  दरवाज़ा  खुला रखा है।

ठोकर न लगे राहों में कभी भी तुमको,
तरगी में चराग़े दिल जला रखा है।

जो आशआरों में न ढल पाया कभी
रंजों-ग़म वो सीने में छुपा रखा है।

दम निकालने की कोई तो हो वजह
बस एक ग़म जाँ से लगा रखा है।

ग़ज़ल 

घर की दीवारें क़द से बुलंद रखना।
सबक़ नहीं ग़ुज़ारिश है याद रखना।

उड़ न जाये याद ख़ुशबू की तरह,
चाक़े-ग़रेबाँ अपना बंद रखना।

मुश्किलें सताएँ ज़माने की तो क्या,
तुम हौसले अपने बुलन्द रखना।

तेरी दोस्ती से ख़फ़ा हैं ज़माने के लोग,
अपनी अदा है अपनी पसंद रखना।

बहोत हो चुका निसाब तुम्हारा,
चंद तल्खियाँ ज़ुबाँ पर रखना।