सूचना

'सर्वहारा' में हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में साहित्य की किसी भी विधा जैसे- कहानी, निबंध, आलेख, शोधालेख, संस्मरण, आत्मकथ्य, आलोचना, यात्रा-वृत्त, कविता, ग़ज़ल, दोहे, हाइकू इत्यादि का प्रकाशन किया जाता है।

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

कहानी

 कांड (कहानी)
                              
                                               
 सुशांत सुप्रिय

मैं अपने भाई से मिलने कुरुक्षेत्र गया। वहीं यह कांड हो गया। वैसे यह कोई बहुत बड़ा कांड नहीं था। किसी राजनेता पर क़ातिलाना हमला नहीं हुआ था। किसी मंत्री या सांसद के अंगरक्षक नहीं मारे गए थे । कहीं कोई आतंकवादी वारदात नहीं हुई थी। न कहीं प्रकृति का क़हर ही बरपा था। घटना बहुत छोटी-सी थी। देश के इतिहास में इसका महत्त्व नगण्य ही माना जाएगा। आप कहेंगे कि ऐसी घटनाएँ तो आए दिन देश के गली-कूचों , शहरों-महानगरों में होती रहती हैं। ऐसे कांड राष्ट्रीय चिंता या शोक का विषय नहीं बनते। ऐसे कांडों के लिए देश का झंडा नहीं झुकाया जाता। ऐसे कांडों के लिए रेडियो या टी. वी. पर कोई मातमी धुन नहीं बजाई जाती। ऐसे कांडों का उल्लेख न इतिहास , न समाजशास्त्र की किसी किताब में होता है। यहाँ तक कि नीति-शास्त्र की किताबें भी ऐसे कांडों के संबंध में ख़ामोश ही रहती हैं। ये बेहद मामूली-सी, लगभग भुला दी जाने वाली घटनाएँ होती हैं क्योंकि ये आम आदमी के साथ घटी होती हैं।
            मैं भाई से मिलने कुरुक्षेत्र पहुँचा। जब स्टेशन पर रेलगाड़ी से उतरा तो रात के आठ बज रहे थे। भाई कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में व्याख्याता है। जब साढ़े आठ बजे वि. वि. परिसर में उसके आवास पर पहुँचा तो मुख्य दरवाज़े पर एक बड़ा-सा ताला मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। पड़ोस में पूछा तो पता चला कि भाई किसी सेमिनार में भाग लेने के लिए आइ. आइ. टी. , रुड़की गया हुआ है। मैं मुश्किल में पड़ गया।
           बाद में कई लोगों ने मुझसे कहा , " यार , यदि चलने से पहले भाई को फ़ोन कर लेते तो पता चल जाता कि वह ' आउट ऑफ़ स्टेशन' है। न तुम यहाँ आते , न यह हादसा होता "
           रात के नौ बज रहे थे। वि. वि. परिसर के बाहर एक ढाबे पर मैं खाना खाने के लिए रुका । खाना खा कर मैंने चाय पी। साढ़े नौ बज गए।
           कुरुक्षेत्र छोटा-सा शहर है । यह दिल्ली नहीं है। यहाँ नौ बजते-बजते अँधेरा गाढ़ा हो जाता है। अँधेरे की अपनी प्रकृति होती है। अँधेरे में पहचाने हुए चेहरे भी अजनबी लगते हैं। दस बजते-बजते सड़क पर एक भुतहा वीरानी छा गई।
           बाद में कई लोगों ने मुझसे कहा - "अरे , भाई। वहाँ पड़ोस में ही किसी के घर रात भर के लिए रुक जाते । इस ज़माने में अजनबी शहर में रात में घूमोगे तो यही होगा।"
           काफ़ी देर इंतज़ार करने के बाद लगभग साढ़े दस बजे सड़क पर एक ऑटो-रिक्शा नज़र आया। उसमें अठारह-बीस साल के दो लड़के बैठे थे। एक ड्राइवर । दूसरा शायद उसका जानकार या मित्र। हर किसी की शक़्ल पर तो लिखा नहीं होता कि वह गुंडा-बदमाश है।
           मैंने पूछा - "स्टेशन चलोगे ?"
           वे बोले - "बैठिए, साहब।"
           आधे घंटे का रास्ता था। मैं दिन में एक-दो बार पहले भी कुरुक्षेत्र आ चुका
हूँ।  पर रात की बात और होती है। रात में अपना शहर भी पराया लगने लगता है।
           जब वे दोनों लड़के ऑटो को अनजानी गलियों में घुमाने लगे तो मुझे शक हुआ । पर जब तक मैं कुछ कर पाता , यह कांड हो गया।
           बाद में कई लोगों ने मुझसे कहा - "अरे, भाई साहब। ये दोनों लड़के आपको कहाँ-कहाँ घुमाते रहे और आपको पता ही नहीं चला। जहाँ यह कांड हुआ , वह जगह तो स्टेशन से काफ़ी दूर है। आप वहाँ कैसे पहुँच गए ?"
          दरअसल आप अपनी रोज़मर्रा की दुनिया में गुम रहते हैं। यदि आप कभी अख़बार में ऐसी घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं या टी. वी. पर ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट देखते हैं तो निश्चिंतता के भाव से कि ये घटनाएँ दूर कहीं किसी और के साथ घटी हैं। आप इन घटनाओं को महज़ आँकड़ों की तरह लेते हैं। आप इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि ऐसी घटनाएँ आप के साथ नहीं घट सकतीं। पर एक दिन अचानक जब ऐसा ही हादसा आपके साथ भी हो जाता है तो आप इसके लिए तैयार नहीं होते। आप हतप्रभ रह जाते हैं।
         एक सूनी गली में ऑटो मोड़कर उन लड़कों ने अचानक ऑटो रोका और झटके से कूदे। न जाने कहाँ से उन्होंने एक सरिया निकाल लिया। बाद में पुलिस सब-इंस्पेक्टर ज़ोरावर सिंह जब शिनाख्त के लिए वह सरिया लेकर घर आया तो मैंने
देखा , वह पूरा लोहा था, जंग लगा , ठोस और सख़्त।
         मैं भी ऑटो की पिछली सीट से बाहर कूदा । वे दो थे। मैं एक। मैं भागा। वे मेरे पीछे भागे। चिल्लाते हुए - "रुपए-पैसे नहीं  देगा तो छोड़ेंगे नहीं।"
         बाद में कई लोगों ने मुझे कहा - "भले आदमी, आराम से रुपए-पैसे दे देते तो यह हाल तो नहीं होता।"
         वे दोनो अठारह-बीस साल के थे। मैं अड़तीस का। लगभग बीस-पच्चीस मीटर बाद उन्होंने मुझे पकड़ लिया । हम गुत्थम-गुत्था हुए। हाथा-पाई में मेरी बनियान और क़मीज़ फट गई।
         अंत में एक लड़के ने मुझे पीछे से दबोच लिया। और दूसरे ने मेरे मुँह पर सरिए से वार किया। बचाव में मैंने अपना बायाँ हाथ आगे किया। सरिए का पूरा वार कोहनी और कलाई के बीच पड़ा । हड्डी के चटखने की आवाज़ साफ़ सुनाई दी। मैं लड़खड़ा गया। और तब मेरे सिर के बीचों-बीच सरिए का एक भरपूर वार पड़ा। आँखों में किसी सुरंग का भयावह अँधेरा भरता चला गया। पीड़ा के असंख्य चमगादड़ ज़हन में एक साथ पंख फड़फड़ाने लगे। फिर शायद एक के बाद एक कई वार हुए। और मैं घुप्प अँधेरे के महा-समुद्र में किसी थके हुए तैराक-सा डूबता चला गया ...
          जब होश आया तो मैं ज़मीन पर लहुलुहान पड़ा हुआ था। सिर पर गहरे घाव थे । बायाँ हाथ सूज कर बेकार हो चुका था। इसी हालत में किसी तरह लड़खड़ाता हुआ मैं उठा और गिरते-पड़ते हुए मैंने चार-पाँच सौ मीटर की दूरी तय की। मैंने पहले मकान का दरवाज़ा खटखटाया । पर कोई बाहर नहीं आया। मैंने न मालूम कितने दरवाज़े खटखटाए । दो-चार लोगों ने दरवाज़े खोले भी पर मुझे इस हाल में देखकर
'पुलिस केस ' के डर से अपने-अपने दरवाज़े फिर बंद कर लिए।
          यह वही काली रात थी जब दिल्ली में ' निर्भया कांड ' की शर्मनाक घटना घटी थी और देश और समाज कलंकित हुआ था।
          गली के अंत में आख़िर एक मकान का दरवाज़ा मेरे खटखटाने पर खुला। किसी को मेरी हालत पर तरस आया। उसने मुझे भीतर बुलाया। पानी पिलाया । फिर पुलिस बुलाई।
          पुलिस वालों ने मुझे सरकारी अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में दाख़िल करा दिया । सिर पर दो जगह आठ-दस टाँके लगे। बायाँ हाथ टूट गया। प्लास्टर लगा।
एफ़. आइ. आर . हुई । मेरा बयान दर्ज़ हुआ । दोनों लड़के मेरे छह-सात हज़ार रुपये ,
मेरा मोबाइल फ़ोन, मेरी कलाई-घड़ी, यहाँ तक कि मेरे जूते भी छीन कर ले गए थे।
           अगली सुबह मैंने घर फ़ोन किया । शाम तक घर से लोग आ गए।
           अस्पताल में जितने लोग मिलने आए , सब ने कुछ-न-कुछ सलाह दी । किसी ने कहा -- " होनी को कौन टाल सकता है। चलो , भगवान का शुक्र है, जान बच
गई। पर आगे से थोड़ा सावधान रहिए।"
            किसी ने कहा - "यदि आपने ऐसा किया होता ..."
            किसी और ने कहा - "यदि वैसा हुआ होता ..."
            -- यदि मैंने चलने से पहले भाई को फ़ोन कर लिया होता ...
            -- यदि हमारे देश में ग़रीबी और बेकारी नहीं होती ...
            -- यदि मैंने उन आटो वाले लड़कों को हाथ दिखा कर नहीं रोका होता ...
            -- यदि हमारे देश के लाखों बच्चों का बचपन और लाखों युवाओं की
            जवानी दो वक़्त की रोटी जुटाने के संघर्ष में नहीं बीतती ...
            -- यदि मैंने बिना संघर्ष किए उन्हें सब कुछ चुपचाप दे दिया होता ...
            -- यदि हमारी हिंदी फ़िल्मों में सेक्स और हिंसा का घातक कॉकटेल नहीं
            होता ...
            लोगों ने त्वरित पुलिस कार्रवाई की भूरि-भूरि प्रशंसा की। एक लड़का धरा गया था। कुछ रुपया-पैसा बरामद हो चुका था। उम्मीद थी कि पहले लड़के से पूछताछ के आधार पर उसका दूसरा साथी भी जल्दी ही पकड़ लिया जाएगा ।
            " घबराने की कोई बात नहीं। हम दूसरे को भी जल्दी ही धर दबोचेंगे" --सब-इंस्पेक्टर ज़ोरावर सिंह ने मूँछों पर ताव देते हुए मुझे कहा।
            "अब आप हमारे गवाह हैं। अदालत में गवाही देने के लिए तैयार रहना। लूट-पाट और जानलेवा हमला का मामला बनता है। हम इस कांड के लिए इन बदमाशों को सजा दिला कर छोड़ेंगे" ज़ोरावर सिंह ने बहुत सारे काग़ज़ों पर मुझ से दस्तख़त कराते हुए मुझे कहा ।
            पर मैं इस सब से बहुत उत्साहित नहीं हूँ। न जाने क्यों मुझे लगता है कि वे दोनों लड़के नहीं होते तो कोई और होते। कुरुक्षेत्र नहीं होता तो कोई और जगह होती। मैं नहीं होता तो शायद आप होते। केवल उन दोनों को सजा हो जाने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा। जब तक समाज में वे कारण मौजूद रहेंगे जो अठारह-बीस साल के लड़कों को अपराधी बना देते हैं, अपराधी बनते रहेंगे , ऐसे कांड होते रहेंगे। क्या आप ऐसा नहीं सोचते?

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लेखक- सुशांत सुप्रिय
            A-5001 ,
            गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम ,
            ग़ाज़ियाबाद - 201014 ( उ. प्र . )
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

शनिवार, 14 जनवरी 2017

कविता

परिचय-
प्रेरणा जानी
नाम - प्रेरणा विनोद जानी 
शिक्षा- MBA,H.R Professional
सम्मान - साहित्य संगम अलख सम्मान, साहित्य संगम दैनिक श्रेष्ठ  रचनाकार सम्मान, हिंदी सेवा सम्मान,नारी सागर सम्मान, श्रेष्ठ युवा रचनाकार सम्मान।
वर्तमान में चेन्नई , तमिलनाडु में निवास, स्थायी तौर पर -  गोंदिया, महाराष्ट्र में निवास। 
ई मेल-janiprerna@gmail.com 
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1.ऐ ज़िंदगी
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मैं तेरे साथ चली..
ऐ ज़िंदगी
मैं तेरे साथ चली,
कभी भीड़ में
कभी तनहाई में,
उजाले और अँधेरे में,
ऐ ज़िंदगी
मैं तेरे साथ चली।
कभी शोर में
कभी शांति में,
दिये की बाती सा
विश्वास लिए
ऐ ज़िंदगी
मैं तेरे साथ चली।
कभी मतलब से
कभी सेवा करने,
दुश्मन से
दोस्ती निभाते,
ऐ ज़िंदगी
मैं तेरे साथ चली।
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2. अब तो मेरा कसूर बताओ ?
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जो माँगा तुमने पाया था,
हम दोनों ने वादा निभाया था,
भूल गये वो कसमें-वादें,
इरादा आपका कुछ समझ न आया था।
पैसों की तुमको चाहत होगी,
मोहब्बत की इनायत होगी,
मिटा देती खुद लीला गर होता मालूम,
कि यहाँ दहेज माँग हर दिन होगी।
उत्पीड़न तिरस्कार सहना होगा,
काम भी घर का करना होगा,
हम नही देख सकते तुम्हारा चेहरा,
तुम्हे हम सब के लिए कुछ करना होगा।
क्यूँ इतना मुझको सताया तुमने,
चेहरा तक मेरा जलाया तुमने,
मैं अपना जीवन तुम्हे मानी थी,
हर कदम पर मुझे रुलाया तुमने।
दिल बोलने में ही रो पड़ेगा,
आत्मा को ही कुछ कहना पड़ेगा,
दुआ है खुदा से इन अत्याचारियों की,
बेटी को भी दुख यही सहना पड़ेगा।
पूछा माँ से मैंने मेरा कसूर बताओ ?
पूछा खुदा से मैंने मेरा कसूर बताओ ?
सब मौन थे मूक थे किया सबने इन्कार,
क्या औरत होना ही था मेरा कसूर बताओ। 
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3. हम साथ साथ हैं
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दिलों में स्नेह हैं,
प्रेम करुणा से  बंधी ये डोर हैं,
चाहे आये कितनी विपत्तियाँ ,
पर हम साथी साथ हैं। 
नैनो में सपने हैं,
पूरे  करने के हौसले हैं,
चाहे कितनी भी हो कठिन डगर,
हम सब साथी साथ हैं। 
जैसे दिये  संग बाती,
जैसे फूलो संग भवरें,
करते प्रार्थना पूरी हो कामना,
सभी की ये मनोकामना,
हम साथी साथ हैं। 
जैसे आँखे करती हो अठखेलियां,
कभी मस्ती में झूमते जिया,
कभी बनता रूहो का काफिला ,
काफिलों के संग हम साथ साथ हैं। 

शनिवार, 7 जनवरी 2017

व्यंग्य

मोबाइल की महिमा न्यारी

कुछ समय पहले दूरदर्शन पर एक लेखनी (कलम) का विज्ञापन आता था, जिसमें उसकी पारदर्शिता के कारण कहा जाता था कि सब कुछ दिखता है, वर्तमान समय में उस लेखनी का क्या हुआ, यह तो पता नहीं, परन्तु एक यन्त्र अवश्य मिल गया है जिसमें सब कुछ दिखता है। कर लो दुनिया मुट्ठी मेंयह वाक्य आप सबको अवश्य याद होगा। अब दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक लोगों के हाथ में वह यन्त्र शोभायमान है। उसका नाम है मोबाइल। सिर पर हेलमेट लगाने को हम अनिवार्य नहीं मानते, परन्तु मोबाइल पर कव्हर चढ़ाना, सुरक्षा गार्ड लगाना, कानों में श्रवण यन्त्र लगाना और झूमना बिल्कुल नहीं भूलते। लोग समझते हैं कि मोबाइल को हमने मुट्ठी में बन्द कर रखा है, जबकि वास्तविकता यह है कि मोबाइल ने हमको पूरी तरह ढँक रखा है। वह आपके वश में नहीं, बल्कि आप उसके वश में हैं। जैसे भगवान भक्त के वश में होते हैं, वैसे ही आप मोबाइल के वश में होते हैं।
घण्टी बजते ही आप चलायमान हो जाते हैं। चाहे आप नहा रहे हों, खा रहे हों, गा रहे हों, नाच रहे हों, कहीं जा रहे हों, या कहीं से आ रहे हों, पढ़ रहे हो, पढ़ रहे हों, पढ़ा रहे हों, पूजा कर रहे हों, रो रहे हों या सो रहे हों। तात्पर्य यह कि यदि आप प्राणवान हैं तो घण्टी का अनुसरण तुरन्त करते हैं, इतनी स्पूर्ति आपको अन्य किसी भी कर्म में आती हो तो बताएँ। प्रेमी-प्रेमिका को डेढ़ बजे समय देकर पौने दो बजे पहुँचते हैं। परिजनों की दवाई दो दिन बात आती है। बिजली का बिल बिना विलम्ब शुल्क के भरते ही नहीं। पानी के बिल को तो भूल ही जाते हैं। मोबाइल कम्पनियों ने जब देखा कि उनका प्रयास निरन्तर फलीभूत हो रहा है तो वे एण्ड्रायड मोबाइल ले आए और उसमें तमाम एप डालकर हममें ऐब पैदा करना शुरू कर दिए। धीरे-धीरे मोबाइल स्तर का पैमाना बन गया। ढाई इंच का मोबाइल अब छह और आठ इंच तक पहुँच गया। वाट्सएप ने ऐसा प्रभाव जमाया कि पास बैठे दो लोग आपस में वार्ता न करके मोबाइल से चैट करते हैं। घर में बैठा पति चाय बनाने के लिए पत्नी को मैसेज करता है। जो घर कभी चहल-पहल का केन्द्र होते थे, मोबाइल ने उनमें मरघट-सी शान्ति ला दी है।
मोबाइल के कारण लेखनी से लिखना लगभग बन्द-सा हो गया है। चिट्ठी पत्री-तार आदि सन्देशवाहकों को मोबाइल ने लील लिया है। अब लोग विवाह में केवल एक कार्ड छपवाते हैं उसे मोबाइल में डाल लेते हैं। उसके प्रतिष्ठार्थ वाले स्थान पर नाम बदल-बदल कर अपने परिजनों को वाट्सएप से भेज देते हैं। इस प्रकार कार्ड छपाई के हजारों रुपये बचा लेते हैं। बीमारी की स्थिति में लोग एक-दूसरे के पास जाकर बैठने और संवेदना प्रकट करने को पुराणपन्थी बातें मानते हैं। चैट करके एक-दूसरे का हाल-चाल जान लेते हैं। किसी की मृत्यु होने पर उसके घर तक नहीं जाते बल्कि मोबाइल से संवेदना सन्देश भेज  देते हैं। किसी की खुशी में शरीक होने के बजाय मोबाइल से शुभकामना, बधाई आदि प्रेषित करना कितना सरल हो गया है।
पहले लोग यात्रा के समय सहयात्री से चर्चा करके अपने सुख-दु:ख बाँटते थे। अब यात्रा कितनी भी लम्बी क्यों न हो। ट्रेन में, बस में, हवाई जहाज में जिसे देखो वही मोबाइल के वशीभूत होकर अपनी मस्ती में मस्त है। आसपास की गतिविधियों की सूचना के लिए कहीं घूमने की आवश्यकता नहीं है। मोबाइल खोलिए, पूरी दुनिया की सूचना उसमें समाहित है। सम्भोग से समाधि तक, गुलामी से आजादी तक, निर्माण से बर्बादी तक की जानकारी आपकी मुट्ठी में है।  मोबाइल में फिल्म देखिए, क्रिकेट, हॉकी, शतरंज आदि मैच  देखिए, कबड्डी और कॉमेडी देखिए। खाना बनाना, नाचना और गाना देखिए, अध्ययन कीजिए, अध्यापन कीजिये अर्थात् आवश्यक/अनावश्यक जो भी आप चाहें, वह सब मोबाइल पर उपलब्ध है। यात्रा हेतु रिजर्वेशन कीजिए, पैसे जमा कीजिए, पैसे निकाल लीजिए, पैसे स्थानान्तरित कर दीजिए। घर बैठे किसी भी परिजन से उसके चित्र सहित चर्चा कीजिए। विवाह आदि सम्बन्ध तय कीजिए, बिना घोड़ी और बाजे के विवाह कर लीजिए और न जमे तो तलाक भी दे दीजिए। मोबाइल से आदि कुछ भी खरीद सकते हैं। कुछ भी बेच सकते हैं, कुछ भी सुन सकते हैं, सुना सकते हैं, किसी से भी मिल सकते हैं, मिला सकते हैं। प्रेम, घृणा, सौहाद्र्र, सद््भाव, सेवा, परोपकार आदि सभी का सम्पादन कर सकते हैं। जोड़ सकते हैं, घटा सकते हैं, भाग दे सकते हैं और गुणा भी कर सकते हैं।
यह बात अलग है कि मोबाइल से इतनी सारी सेवाएँ लेने के बदले उसे कुछ देना भी पड़ता है। मसलन मोबाइल को रिचार्ज करना पड़ता है। बैटरी चार्ज करनी होती है। बहुत-सा समय देना होता है। परिजनों से दूर रहना होता है। गाना सुनते हुए वाहन चलाना कभी-कभी असमय अपाहिज भी कर सकता है अथवा जान भी देनी पड़ सकती है। बहरे होने की सम्भावना रहती है। बहुत देर तक उसमें ताका-झाँकी करने से आँखों की रोशनी भी जा सकती है। मोबाइल थामने वाले हाथों में सुन्नपन अथवा लकवा भी हो सकता है। एक ही आसन पर बहुत देर तक बैठकर मोबाइल में खोये रहने से कब्ज, एसिडिटी और मोटापा भी हो सकता है। स्वाभाविक चिड़चिड़ापन भी आता है। क्रोध की मात्रा में प्रगति होती है। ये सारे ऐब मोबाइल के योगदान वाले ऐप के सामने नगण्य हैं। दूध देने वाली गाय के दो लात खाने में ही ग्वाला अपनी भलाई समझता है। मोबाइल ने याददाश्त को कम कर दिया है। दिमाग जैसी नायाब चीज पर जोर लगाने की जरूरत नहीं है। कई लोग तो खुद का नम्बर भी मोबाइल में देखकर ही बता पाते हैं। परिजनों की पहचान, मोबाइल में सेव किए गए चित्रों से होती है। वैवाहिक वर्षगाँठ अथवा जन्मदिन सब अपने-अपने मोबाइल पर पहले से ही लोड फिल्म देखकर मना लेते हैं। इस प्रकार व्यवस्थाओं पर होने वाले खर्च को बचाते हैं और वह पैसा खुद के इलाज पर लगाते हैं। आप सुखी-संसार सुखी कहावत को मोबाइल कम्पनियाँ चरितार्थ कर रही हैं। दस गुने भाव में मोबाइल बेच रही हैं। सब कुछ दिखा रही हैं। फोन, सन्देश, बैंकिंग, नेटवर्किंग,चैटिंग आदि से अपार धन कमा रही है। चूँकि हमें विकासशील से विकसित की सूची में जाना है अत: विकसित लोगों की चाल में चाल मिलाना है। भले ही परिवार, समाज और यहाँ तक कि अपनों से ही दूर क्यों न होना पड़े, परन्तु जब हमने ठान लिया है, तो विकसित लोगों की सूची में नाम लिखाए बिना दम नहीं लेंगे, भले ही इसके चक्कर में हमारा दम ही क्यों न निकल जाए।
कुछ काम अभी भी ऐसे हैं जो मोबाइल नहीं कर सकता, उनके विषय में विचार करने की आवश्यकता है। मोबाइल मृत्यु के अवसर पर कन्धे नहीं लगा सकता। खुशी में खुश और दु:ख में दु:खी नहीं हो सकता। मोबाइल आपको भोजन नहीं परोस सकता, दवाई नहीं दे सकता। पानी नहीं पिला सकता। आपके सिर में तेल नहीं डाल सकता, आपके घाव पर पट्ठी नहीं बाँध सकता। आपसे संवेदना के दो बोल नहीं बोल सकता। मोबाइल एक यन्त्र है, वह आपको केवल यन्त्र बना सकता है। संवेदनाओं के लिए परिजनों की आवश्यकता होती है। निवेदन है कि यन्त्र में इतने अधिक न खो जाएँ कि उसके कारण एक तरफ आपके परिजन खो जाएँ और दूसरी तरफ अवसाद से ग्रसित एक दिन स्वयं आपका जीवन भी खो जाए।
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डॉ. स्वामीनाथ पाण्डेय
एम-24, महाशक्तिनगर, उज्जैन (म.प्र.)
मोबा. 98270-67961


शनिवार, 10 दिसंबर 2016

कविता

डॉ. भरत प्रसाद

डॉ. भरत प्रसाद की कविताओं में मानवीय अस्तित्त्व के कई संदर्भों का मिलना; कविता के माध्यम से जीवन की स्थापना और चुनौतियों के समक्ष अकेले खड़े हो जाने के साहस के समान है। सत्ता, स्वार्थ और शासन व्यक्ति की स्वतन्त्रता को लील रहा है, भरत प्रसाद की कविताएँ इस प्रकार की घृणित अवस्था के विरुद्ध संघर्ष की आग को जलाए रखने का समर्थन करती हैं और व्यक्ति के भीतर सोये हुए उस अहम को जाग्रत करती हैं, जिसने अभी कुछ खोया नहीं, बल्कि पाने के लिए सारी दुनिया से संघर्ष करना है। 

सम्पादक- सर्वहारा (डॉ. मोहसिन ख़ान)
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1. प्रतिरोध अमर है

जब फुफकारती हुई मायावी सत्ता का आतंक
जहर के मानिंद हमारी शिराओं में बहने लगे,
जब झूठ की ताकत सच के नामोनिशान मिटाकर
हमारी आत्मा पर घटाटोप की तरह छा जाय,
जब हमारी जुबान फ़िजाओं में उड़ती दहशत की सनसनी से
गूंगी हो जाय,
जब हमारा मस्तक सैकड़ों दिशाओं में मौजूद तानाशाही की माया से
झुकते ही चले जाने का रोगी हो जाय,
तो प्रतिरोध अनिवार्य है!!!
अनिवार्य है वह आग जिसे इन्कार कहते हैं,
बेवशी वह जंजीर है जो हमें मुर्दा बना देती है
विक्षिप्त कर देती है वह पराजय,
जो दिन रात चमड़ी के नीचे धिक्कार बनकर टीसती है
गुलामी का अर्थ
अपने वजूद की गिरवी रखना भर नहीं है,
न ही अपनी आत्मा को बेमौत मार डालना है
बल्कि उसका अर्थ
अपनी कल्पना को अंधी बना देना भी है
अपने इंसान होने का मान यदि रखना है,
तो आँखें मूँद कर कभी भी पीछे पीछे मत चलना
हाँ हाँ की आदत अर्थहीन कर देती है हमें
जी जी कहते कहते एक दिन नपुंसक हो जाते हैं हम
तनकर खड़ा न होने की कायरता
एक दिन हमें जमीन पर रेंगने वाला कीड़ा बना देती है
जरा देखो ! कहीं अवसरवादी घुटनों में घुन तो नहीं लग गए हैं
पंजों की हड्डियां कहीं खोखली तो नहीं हो गयी हैं
हर वक्त झुके रहने से,
रीढ़ की हड्डी गलने तो नहीं लगी है
पसलियाँ चलते फिरते ढाँचे में तब्दील तो नहीं होने लगी हैं
जरा सोचो !
दोनों आँखें कहीं अपनी जगह से पलायन तो नहीं करने लगी हैं
अपमान की चोट सहकर जीने का दर्द
पूछना उस आदमी से
जो अपराध तो क्या अन्याय तो क्या
सूई की नोंक के बराबर भी झूठ बोलते समय
रोवां रोवां कांपता है। 
याद रखना
आज भी जालसाज की प्रभुसत्ता
सच्चाई के सीने पर चढ़कर उसकी गर्दन तोड़ते हुए
खूनी विजय का नृत्य करती है,
आज भी ऐय्याश षड्यंत्र के गलियारे में
काटकर फेंक दी गयी ईमानदारी की आत्मा
मरने से पहले सौ सौ आंसू रोती है
अपनी भूख मिटाने के लिए,
न्याय को बेंच बांचकर खा जाने वाले व्यापारी
फैसले की कुर्सी पर पूजे जाते हैं आज भी
आज का आदमी,
उन्नति के बरगद पर क्यों उल्टा नजर आता है। 
आज दहकते हुए वर्तमान के सामने
उसका साहसिक सीना नहीं
सिकुड़ी हुई पीठ नजर आती है
आज हम सबने अपनी अपनी सुरक्षित बिल ढूंढ ली है
जमाने की हकीकत से भागकर छिपने के लिए
इससे पहले कि तुम्हारे जीवन में
चौबीस घंटे की रात होने लगे
रोक दो मौजूदा समय का तानाशाह पहिया
मोड़ दो वह अंधी राह
जो तुम्हें गुमनामी के पागलखाने के सिवाय
और कहीं नहीं ले जाती
फिज़ा में खींच दो न बन्धु !
इन्कार की लकीर
आज तनिक लहरा दो न !
ना कहने वाला मस्तक
बर्फ की तरह निर्जीव रहकर
सब कुछ चुपचाप सह जाने का वक्त नहीं है यह।
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2. आत्म हत्या की सदी

मृत्यु का एहसास
मेरे हर दिन की हकीकत है
इसमें मैं हर पल जीता हूँ
यह मुझे हर पल खाती है
नसों में लावा की तरह बहती
कोई आग है यह
जिसे हर सांस पीता हूँ,
मुझसे कहिये न मौन
मैं काठ बन जाऊँगा
मुझसे कहिये न त्याग
मैं मिट्टी हो जाऊंगा,
मगर मुझसे मत कहियेगा हंसो
मैं रो भी नहीं पाऊंगा
पेट फ़ैल गया है शरीर में
माया की तरह,
भूख जैसी पीड़ा पूरे बदन से उठती है
हड्डी दर हड्डी में
मस्तक में इंच इंच
नाचती है भूख
आत्मा में गूंजता है मौत का अनहदपन
ह्रदय से धिक्कार उठती है अपने ही जीने पर
पानी अब पानी नहीं पेट का अन्न है
पत्थर मन भूला है
श्मशानी अतीत,
भूला है ह्रदय दीयों का बुझ जाना
देखा है देखा है
गांवों की अकाल मृत्यु
जीते जी टूटना ए टूट कर बिखर जाना।
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3. गूंगी आँखों का विलाप

आओ ए आओ !
तनिक उठाओ मेरी आत्मा को
सुलगा दो मेरी चेतना
झकझोर दो मेरी जड़ता
चूर चूर कर डालो मेरा पत्थर पन
तुम्हें पहचानने में कहीं देर न हो जाय
नहीं चलने दूंगा
तुम्हारे खिलाफ अपने मन की बेईमानी
नहीं बढ़ने दूंगा
तुम्हारे खिलाफ अपने उठे हुए कदम
नहीं सोने दूंगा
तुमसे बेफिक्र रहकर जीती हुई शरीर
मजाल क्या कि
तुम्हारे सपनों का सपना देखे बगैर
मेरी आँखें चैन से सो जाएँ
गहरी लकीरों से पटे
तुम्हारे निष्प्राण चेहरे का
असली गुनहगार कौन है ?
जीवन के हर मोर्चे पर
तुम्हारी शरीर को ढाल बनाने वाला
मेरे सिवा कौन है?
यह मैं ही हूँ
जो तुम्हें तुम्हारे ही देश से
बेदखल करता रहा हूँ निरंतर
भीतर बाहर से
टूट- टाट चुकी तुम्हारी शरीर को
सहलाने का जी क्यों करता है?
क्या है तुम्हारी आँखों में कि
सदियाँ विलाप करती हैं
तुम्हारा मौन चेहरा
हमें धिक्कारता ही क्यों रहता है ?
तुम्हारे मुड़े तुड़े ढाँचे को देखकर
मैं अपनी ही नजरों में क्यों गिरने लगता हूँ ?
रोम रोम पर दर्ज है
तुम्हारे खून पसीने का कर्ज
मिट ही नहीं सकते पृथ्वी से
तुम्हारे पैरों के निशान
गूंजता है सीने में
तुम्हारे सीधेपन का इतिहास
मचलता है मेरी आँखों में
तुम्हारी गूंगी आँखों का विलाप। 
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4. पहरेदार हूँ मैं

अगर कातिल के खिलाफ कुछ भी न बोलने की
तुमने ठान ली है
अगर हत्यारों को पहचानने से इन्कार करने पर
तुम्हें कोई आत्म ग्लानि नहीं होती
अगर लुटेरों को न ललकारने का
तुम्हें कोई पक्षतावा नहीं
अगर अन्धकार में जीना तुम्हें प्यारा लगने लगा है
तो जरा होश में आ जाओ
मेरे शब्द चौकीदार की तरह
तुम्हारे चरित्र के एक एक पहलू पर रात दिन पहरा देते हैं
तुम्हारी करतूतों के पीछे घात लगाए बैठे हैं वे
तुम तो क्या तुम्हारी ऊँची से ऊँची
धोखेबाज कल्पना भी
उनकी पकड़ से बच नहीं पायेगी
परत-दर-परत एक दिन खोल खालकर
तुम्हें नंगा कर देंगे मेरे शब्द
तुम दोनों हाथों से बर्बादी के बीज बोते हो
पता है मुझे
तुम्हारी दोनों आँखों को
बेहिसाब नफरत करने का रोग लग चुका है
तुम्हारे पैरों में रौंदने की सनक सवार है
तुम्हारी जीभ से हर वक्त ये लाल लाल क्या टपकता है ?
तुम्हारी सुरक्षा के लिए सत्ता ने पूरी ताकत झोंक दी है
आज तुम सबसे ज्यादा सुरक्षित हो
तुम्हारे इर्द गिर्द हवा भी
तुम्हारे विपरीत बहने से कांपती है
तुमने इंच दर.इंच
अपने बचाव के लिए दीवारें तो खड़ी कर दी हैं
फिर भी… फिर भी… फिर भी….
अपनी आसन्न मौत के भय से
सूखे पत्ते की तरह हाड़ हाड़ कांपते हो
पता है मुझे
यहाँ यहाँ इधर सीने के भीतर
रह रहकर लावा फूटता है
नाच नाच उठता है सिर
तुम्हारे खेल को समझते बूझते हुए भी
जड़ से न उखाड़ पाने के कारण
अन्दर अन्दर लाचार धधकता रहता है
अपने पेशे के माहिर खिलाड़ी हो लेकिन
अपने मकसद में कामयाब रहते हो लेकिन
घोषित तौर पर विजेता जरूर हो लेकिन
विचारों की मार भी कोई चीज होती है
सच की धार भी कोई चीज होती है
तुमसे लड़ लड़कर मर जाने के बाद
मैं न सही
मेरी कलम से निकला हुआ एक एक शब्द
तुम्हारी सत्ता और शासन के खिलाफ
मोर्चा दर मोर्चा बनाता ही रहेगा।
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5. मुस्कुराता है हत्यारा


हत्यारे आजकल हत्यारे नहीं लगते
हिंसक नहीं दिखते
अपराधी भी नहीं
अनपढ़ तो बिल्कुल नहीं
सिर से पाँव तक आदर्श की प्रतिमा लगते हैं हत्यारे
वे खूब समझते हैं प्राणों की कीमत
उन्हें पता है, मौत का दर्द
इंसानियत का ऐसा कोई पाठ नहीं
जो उनकी समझ से बाहर हो
परन्तु इन्हीं के पैरों तले मर रही है पृथ्वी
इन्हीं की छायाएँ नाच रही हैं लाल धरती पर
इतिहास के पन्ने-दर- पन्ने पर
पंजों के निशान
नफरत फूटती है इनकी आँखों से
साहसी आँखों के खिलाफ
दहकती है सीने में
तनी हुई गर्दनों की प्यास
हत्यारे कभी रोते नहीं
जल्दी हँसते भी नहीं
बस मुस्कुरा देते हैं,
अपने सपनों की सफलता पर
कभी भी, कहीं भी
किसी भी देश और किसी भी युग में
छाया की तरह होते हैं हत्यारे
हत्या से अधिक भयानक होती है
हत्यारों की मुस्कान।
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रचनाकार का परिचय- 
नाम - भरत प्रसाद
जन्म - 25 जनवरी, 1970 ई., ग्राम - हरपुर, जिला - संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा - एम. ए., एम. फिल. और पीएच. डी. जवाहरलाल नेहरू वि. वि. नई दिल्ली।
रुचियाँ - साहित्य, सामाजिक कार्य और पेंटिंग।
पुस्तकें - 1. और फिर एक दिन (कहानी संग्रह) इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली,2004 ई. (पुरस्कृत), 2. देसी पहाड़ परदेसी लोग (लेख संग्रह) शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, (उ. प्र.) वर्ष - 2007 ई. (पुरस्कृत), 3. एक पेड़ की आत्मकथा (काव्य संग्रह) अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद, (उ. प्र.) वर्ष - 2009 ई. (पुरस्कृत)
4. नई कलम: इतिहास रचने की चुनौती (आलोचना) अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद, (उ. प्र.) वर्ष - 2012 ई., 5. सृजन की इक्कीसवीं सदी (लेख संग्रह) नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, (उ. प्र.) वर्ष - 2013 ई., 6. बीच बाजार में साहित्य: (लेख संग्रह), शिल्पायन पब्लिशर्स एण्ड डिस्टीªब्यूटर्स, दिल्ली, 2016 ई., 7. चौबीस किलो का भूत: (कहानी संग्रह), साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2016 ई.,8. कहना जरूरी है (विचार ) प्रतिश्रुति प्रकाशन , कलकत्ता , २०१६ ई.
प्रकाशित रचनाएं: हिन्दी साहित्य की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में लेखों, कविताओं एवं कहानियों का निरंतर प्रकाशन।
सम्पादन : ‘जनपथ’ पत्रिका के युवा कविता विशेषांक - ‘सदी के शब्द प्रमाण’ का सम्पादन - 2013 ई.।
पुरस्कार : 
1. सृजन-सम्मान - 2005 ई. रायपुर (छत्तीसगढ़)
2. अम्बिका प्रसाद दिव्य रजत अलंकरण, वर्ष- 2008 ई. भोपाल (मध्यप्रदेश)
3. युवा शिखर सम्मान - 2011, शिमला (हिमाचल प्रदेश)
4. मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार - 2014 ई., अलीगढ़, (उ.प्र.)
5. पूर्वोत्तर साहित्य परिषद् पुरस्कार, शिलांग (मेघालय)
स्तम्भ-लेखन : 
1. ‘परिकथा’ पत्रिका के लिए ‘ताना-बाना’ शीर्षक से स्तम्भ-लेखन (200
2 . ‘लोकोदय’ पत्रिका के लिए ‘गहरे पानी पैठि’ शीर्षक से स्तम्भ लेखन।
रचना-अनुवाद : लेख और कविताओं का अंग्रेजी, बांग्ला एवं पंजाबी भाषाओं में अनुवाद।
स्थायी पता : 
ग्राम-हरपुर, पोस्ट - पचनेवरी, जिला- संतकबीर नगर, 272271 (उ.प्र.)
संप्रति एवं वर्तमान पता: 
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय,
शिलांग, 793022 (मेघालय)
फोन - 0364-2726520 (आवास), मो. 09863076138, 09774125265
ई-मेल: deshdhar@gmail.com
bharatprasadnehu@gmail.com

रविवार, 4 दिसंबर 2016

कविता

नफ़रतों से पैदा नहीं होगा इन्किलाब
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लेना-देना नहीं कुछ
नफ़रत का किसी इन्कलाब से
नफ़रत की कोख से कोई इन्कलाब
होगा नहीं पैदा मेरे दोस्त
ताने, व्यंग्य, लानतें और गालियाँ
पत्थर, खंज़र, गोला-बारूद या कत्लो-गारत
यही तो हैं फसलें नफ़रत की खेती की...
तुम सोचते हो कि नफरत के कारोबार से
जो भीड़ इकट्ठी हो रही है
इससे होगी कभी प्रेम की बरसा ?
बार-बार लुटकर भी खुश रह सके
ये ताकत रहती है प्रेम के हिस्से में
नफ़रत तो तोडती है दिल
लूटती है अमन-चैन अवाम का...
प्रेम जिसकी दरकार सभी को है
इस प्रेम-विरोधी समय में
इस अमन-विरोधी समय में
इस अपमानजनक समय में
नफ़रत की बातें करके
जनांदोलन खड़ा करने का
दिवा-स्वप्न देखने वालों को
सिर्फ आगाह ही कर सकता है कवि
कि कविता जोड़ती है दिलों को
और नफ़रत तोड़ती है रिश्तों के अनुबंध
नफरत से भड़कती है बदले की आग
इस आग में सब कुछ जल जाना है फिर
प्रेम और अमन के पंछी उड़ नहीं पायेंगे
नफ़रत की लपटों और धुंए में कभी भी
ये हमारा रास्ता हो नहीं सकता
मुद्दतों की पीड़ा सहने की विरासत
अपमान, तिरस्कार और मृत्यु की विरासत
हमारी ताकत बन सकती है दोस्त
इस ताकत के बल पर
हम बदल देंगे दृश्य एक दिन
ज़रूर एक दिन, देखना...
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कैसे निभे लोकाचार
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आहट से फर्क नहीं पड़ता
इंतज़ार की हो चुकी इन्तहा
कोई कभी नहीं आता
कोई उम्मीद द्वार नहीं थपथपाती
कोई आवाज़ पलट कर नहीं आती
मुद्दतों से सुनी भी नहीं गई
अपने नाम की पुकार
जैसे बिसरा देता इंसान
दुःख भरे दिनों को
भुला दिया गया हूँ मैं
ड्राइंग रूम के कोने में रखे
फोन की घण्टियाँ भी बजती नहीं
आने को आता है नल में पानी
अखबार, दूध, धोबी, नौकरानी
कभी-कभी कोई चन्दा मांगने वाला
हाँ, सड़क से लांघ कर आ जाती हैं आवाज़ें
पड़ोस के बच्चों की चिल्लाहटें
और कभी तो डराती है
दीवार घड़ी की टिक-टिक
जैसे कोई हथौड़ी से कर रहा हो प्रहार
ऐसे में कोई कैसे निभाये लोकाचार
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रचनाकार का परिचय- 
नाम- अनवरा सुहैल
जन्म- 09 अक्तूबर 1964

स्थान- जांजगीर (छत्तीसगढ़)
रचनाएँ-
उपन्यास- पहचान, सलीमा,
कहानी-संग्रह- कुंजड़ कसाई, चहल्लुम, गहरी जड़ें,
काव्य संकलन- संतों काहे की बेचैनी, थोड़ी सी शर्म दे मौला, कुछ भी नहीं बदला (सद्य प्रकाशित) 
सम्मान- (गहरी जड़ें) पर मध्य प्रदेश से वागेश्वरी सम्मान 2014 में 
संपादक- संकेत कविता केन्द्रित पत्रिका 
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संप्रति- 
कोल इंडिया लिमिटेड सीनियर मैनेजर (माइन)
संपर्क-
टाइप IV-3, बिजुरी, अनुपपुर म.प्र. ४८४४४०

मोबाइल- 09907978108
sanketpatrika@gmail.com

रविवार, 27 नवंबर 2016

कविता

1. कुछ समुदाय हुआ करते हैं  ( रोहित वेमुला को समर्पित )
सुशांत सुप्रिय

                                                          
कुछ समुदाय हुआ करते हैं
जिनमें जब भी कोई बोलता है
' हक़ ' से मिलता-जुलता कोई शब्द
उसकी ज़ुबान काट ली जाती है,
जिनमें जब भी कोई अपने अधिकार माँगने
उठ खड़ा होता है
उसे ज़िंदा जला दिया जाता है। 

कुछ समुदाय हुआ करते हैं
जिनके श्रम के नमक से
स्वादिष्ट बनता है औरों का जीवन
किंतु जिनके हिस्से की मलाई
खा जाते हैं,
कुल और वर्ण की श्रेष्ठता के
स्वयंभू ठेकेदार कुछ अभिजात्य वर्ग। 


सबसे बदहाल, सबसे ग़रीब
सबसे अनपढ़ , सबसे अधिक
लुटे-पिटे करोड़ों लोगों वाले
कुछ समुदाय हुआ करते हैं,
जिन्हें भूखे-नंगे रखने की साज़िश में
लगी रहती है एक पूरी व्यवस्था। 

वे समुदाय
जिनमें जन्म लेते हैं बाबा साहेब अंबेडकर
महात्मा फुले और असंख्य महापुरुष
किंतु फिर भी जिनमें जन्म लेने वाले
करोड़ों लोग अभिशप्त होते हैं,
अपने समय के खैरलाँजी या मिर्चपुर की
बलि चढ़ जाने को। 

वे समुदाय
जो दफ़्न हैं
शॉपिंग माॅल्स और मंदिरों की नींवों में
जो सबसे क़रीब होते हैं मिट्टी के
जिनकी देह और आत्मा से आती है,
यहाँ के मूल बाशिंदे होने की महक
जिनके श्रम को कभी पुल, कभी नाव-सा
इस्तेमाल करती रहती है,
एक कृतध्न व्यवस्था
लेकिन जिन्हें दूसरे दर्ज़े का नागरिक
बना कर रखने के षड्यंत्र में
लिप्त रहते हैं कई वर्ग। 


आँसू, ख़ून और पसीने से सने
वे समुदाय माँगते हैं,
अपने अँधेरे समय से
अपने हिस्से की धूप
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से का आकाश
अपने हिस्से का पानी
किंतु उन एकलव्यों के
काट लिए जाते हैं अंगूठे
धूर्त द्रोणाचार्यों के द्वारा। 

वे समुदाय
जिनके युवकों को यदि
हो जाता है प्रेम
समुदाय के बाहर की युवतियों से,
तो सभ्यता और संस्कृति का दंभ भरने वाली
असभ्य सामंती महापंचायतों के मठाधीश
उन्हें दे देते हैं मृत्यु-दंड। 

वे समुदाय
जिन से छीन लिए जाते हैं
उनके जंगल, उनकी नदियाँ , उनके पहाड़
जिनके अधिकारों को रौंदता चला जाता है,
कुल-शील-वर्ण के ठेकेदारों का तेज़ाबी आर्तनाद। 

वे समुदाय जो होते हैं
अपने ही देश के भूगोल में विस्थापित
अपने ही देश के इतिहास से बेदख़ल
अपने ही देश के वर्तमान में निषिद्ध
किंतु टूटती उल्काओं की मद्धिम रोशनी में,
जो फिर भी देखते हैं सपने
विकल मन और उत्पीड़ित तन के बावजूद
जिन की उपेक्षित मिट्टी में से भी
निरंतर उगते रहते हैं सूरजमुखी। 

सुनो द्रोणाचार्यो
हालाँकि तुम विजेता हो अभी
सभी मठों पर तैनात हैं,
तुम्हारे ख़ूँख़ार भेड़िए
लेकिन उस अपराजेय इच्छा-शक्ति का दमन
नहीं कर सकोगे तुम
जो इन समुदायों की पूँजी रही है सदियों से
जहाँ जन्म लेने वाले हर बच्चे की
आनुवंशिकी में दर्ज है,
अन्याय और शोषण के विरुद्ध
प्रतिरोध की ताक़त। 

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 2. मासूमियत
                                   
मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में
वयस्क आँखें बो दीं
वहाँ कोई फूल नहीं निकला
किंतु मेरे घर की सारी निजता
भंग हो गई। 

मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में
वयस्क हाथ बो दिए
वहाँ कोई फूल नहीं निकला
किंतु मेरे घर के सारे सामान
चोरी होने लगे। 

मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में
वयस्क जीभ बो दी
वहाँ कोई फूल नहीं निकला
किंतु मेरे घर की सारी शांति
खो गई। 

हार कर मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में
एक शिशु मन बो दिया
अब वहाँ एक सलोना सूरजमुखी
खिला हुआ है। 
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3. जो नहीं दिखता दिल्ली से
                              
बहुत कुछ है जो
नहीं दिखता दिल्ली से,

आकाश को नीलाभ कर रहे पक्षी और
पानी को नम बना रही मछलियाँ
नहीं दिखती हैं दिल्ली से। 

विलुप्त हो रहे विश्वास
चेहरों से मिटती मुस्कानें
दुखों के सैलाब और
उम्मीदों की टूटती उल्काएँ
नहीं दिखती हैं दिल्ली से। 

राष्ट्रपति भवन के प्रांगण
संसद भवन के गलियारों और
मंत्रालयों की खिड़कियों से,
कहाँ दिखता है सारा देश,

मज़दूरों-किसानों के
भीतर भरा कोयला और
माचिस की तीली से,
जीवन बुझाते उनके हाथ
नहीं दिखते हैं दिल्ली से,

मगरमच्छ के आँसू ज़रूर हैं यहाँ
किंतु लुटियन का टीला
ओझल कर देता है आँखों से
श्रम का ख़ून-पसीना और
वास्तविक ग़रीबों का मरना-जीना। 

चीख़ती हुई चिड़ियाँ
नुचे हुए पंख
टूटी हुई चूड़ियाँ और
काँपता हुआ अँधेरा
नहीं दिखते हैं दिल्ली से। 

दिल्ली से दिखने के लिए
या तो मुँह में जयजयकार होनी चाहिए
या फिर आत्मा में धार होनी चाहिए। 
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4. कठिन समय में
                       
बिजली के नंगे तार को छूने पर
मुझे झटका लगा
क्योंकि तार में बिजली नहीं थी। 

मुझे झटका लगा इस बात से भी कि
जब रोना चाहा मैंने तो आ गई हँसी
पर जब हँसना चाहा तो आ गई रुलाई। 

बम-विस्फोट के मृतकों की सूची में
अपना नाम देख कर फिर से झटका लगा मुझे :
इतनी आसानी से कैसे मर सकता था मैं,

इस भीषण दुर्व्यवस्था में
इस नहीं-बराबर जगह में
अभी होने को अभिशप्त था मैं ...
जब मदद करना चाहता था दूसरों की
लोग आशंकित होते थे यह जानकर
संदिग्ध निगाहों से देखते थे मेरी मदद को
गोया मैं उनकी मदद नहीं
उनकी हत्या करने जा रहा था। 

बिना किसी स्वार्थ के मैं किसी की मदद
कैसे और क्यों कर रहा था
यह सवाल उनके लिए मदद से भी बड़ा था

ग़लत जगह पर सही काम करने की ज़िद लिए
मैं किसी प्रहसन में विदूषक-सा खड़ा था!!!

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रचनाकर का परिचय 
नाम : सुशांत सुप्रिय
जन्म : 28 मार्च , 1968 शिक्षा : अमृतसर ( पंजाब ) , व दिल्ली में ।
प्रकाशित कृतियाँ :
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# हत्यारे ( 2010 ) , हे राम ( 2013 ) , दलदल ( 2015 ) : तीन कथा - संग्रह ।
# इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ( 2015 ) ,अयोध्या से गुजरात तक ( 2016 ): दो काव्य-संग्रह ।
सम्मान :
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भाषा विभाग ( पंजाब ) तथा प्रकाशन विभाग ( भारत सरकार ) द्वारा रचनाएँ पुरस्कृत। कमलेश्वर-कथाबिंब कहानी प्रतियोगिता ( मुंबई ) में लगातार दो वर्ष  प्रथम पुरस्कार। स्टोरी-मिरर.कॉम कथा प्रतियोगिता , 2016 में कहानी पुरस्कृत ।
अन्य प्राप्तियाँ :
--------------
# कई कहानियाँ व कविताएँ अंग्रेज़ी , उर्दू , पंजाबी, उड़िया, मराठी, असमिया , कन्नड़ , तेलुगु व मलयालम आदि भाषाओं में अनूदित व प्रकाशित । कहानियाँ केरल के कलडी वि.वि. ( कोच्चि ) के एम.ए. (हिंदी), तथा मध्यप्रदेश , हरियाणा व महाराष्ट्र के कक्षा सात व नौ के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल । कविताएँ पुणे वि. वि. के बी. ए.( द्वितीय वर्ष ) के पाठ्य-क्रम में शामिल । कहानियों पर आगरा वि. वि. , कुरुक्षेत्र वि. वि. , पटियाला वि. वि. , व गुरु नानक देव वि. वि. , अमृतसर के हिंदी विभागों में शोधार्थियों द्वारा शोध-कार्य ।
# अंग्रेज़ी व पंजाबी में भी लेखन व प्रकाशन । अंग्रेज़ी में काव्य-संग्रह  ' इन गाँधीज़ कंट्री ' प्रकाशित । अंग्रेज़ी कथा-संग्रह ' द फ़िफ़्थ डायरेक्शन ' और अनुवाद की पुस्तक 'विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ' प्रकाशनाधीन ।
ई-मेल : sushant1968@gmail.com
मोबाइल : 8512070086

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पता: A-5001,गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम ,
ग़ाज़ियाबाद - 201014 ( उ. प्र. )

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प्रकाशित रचनाएँ लेखक की अपनी विचारधारा और भावना पर आधारित रचित हैं, सर्वहारा या अन्य कोई भी सहमत-असहमत हो सकता है।