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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

ग़ज़ल

ग़ज़ल

वो शान से चल दिया चर्चा शहर में था,
देखा सबने न उस दिन कोई घर में था ।

उसके आमाल देखकर मैं दंग रह गया,
आज वो अख़बार की हर ख़बर में था ।

सब की आंखें नम थीं और दिल ग़मगी़ं,
उसका चेहरा सबकी नज़र में था ।

क्या मक़ाम हांसिल था, सब कहते रहे,
अभी तो वो मंज़िल के सफ़र में था ।


ग़ज़ल


काश हमको भी माँ-बाप ने पाला होता,
उनके हाथों का मुँह में निवाला होता ।

होकर तैयार रोज़ जाते बैठकर बस में,
किसी ने हमको स्कूल में डाला होता ।

सड़कों, गलियों की अँधेरी रात की ज़िंदगी,
हमारी दुनिया में भी रेशमी उजाला होता ।

यूँ न गिरते अपनी नज़र में आज हम,
गर हमें भी किसी ने सँभाला होता ।

डॉ. मोहसिन ख़ान
अलीबाग़ (महाराष्ट्र)