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रविवार, 22 सितंबर 2013

ग़ज़ल

ग़ज़ल

तुझको मेरी अब ख़बर कहाँ ।
एक राह का अब सफ़र कहाँ ।

जिसकी ख़ामोशी गुनगुनाती थी,
बातों में उसकी अब असर कहाँ ।

मैं न देखकर भी देख लेता हूँ,
उसकी ऐसी अब नज़र कहाँ ।

की अदावत सारी दुनिया से,
मेरी उसको अब क़दर कहाँ ।

तन्हा उताश ही रहता है सदा,
पहली सी अब अज़हर कहाँ ।


 ग़ज़ल


अबके जाने  कैसा  दौर हुआ है ।
आदमी कितना कमज़ोर हुआ है ।

सच की आवाज़ सुन नहीं सकते ,
झूटों का कितना शोर हुआ है ।

बचते हैं सब  हरेक  निगाह से,
इंसान क्यों आदमख़ोर हुआ है ।

कोइ रोशनी नहीं, बस्ती जलती है ,
किस क़दर धुँआ घनघोर हुआ है ।

फ़िज़ाओं में कैसा बारूद घुला है,
अब ये धमाका किस ओर हुआ है ।

इस कहानी का कोई अन्त नहीं,
यहाँ सिपाही ख़ुद चोर हुआ है ।