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रविवार, 5 जनवरी 2014

ग़ज़ल

ऊँचा उसका क़द हो गया ।
ग़ुरूर उसे बेहद  हो गया ।

ख़ौफ़ से  सिर  झुकवाकर,
अवाम का समद हो गया ।

फैलाकर  सूबे  में  दहशत,
गुनाहों का सनद हो गया ।

जिसने  हाथ रंगे  थे ख़ून से,
गवाहों में नामज़द हो गया ।

खिलाफ़ते क़ौमपरस्तिश में,
'तन्हा'  क्यों  बद हो गया ।


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क्या बात बुरी लगी ज़माने की ।

जो भुलादी आदत मुस्कुराने की ।



दीवार  बनके  खड़ी  है मुसीबत,


फ़िर हो एक कोशिश गिराने की ।



लगाकर  गले  भुलादो  रंजिशें,


बात हो  नफ़रतें  मिटाने  की ।



दहशदगर्दी  के  नाम पे क़त्ल,


ज़रुरत है  मुद्दआ  उठाने की ।



झुलसा है मुल्क़  कौमी  दंगों में,


चल रही है साज़िश जलाने की।



'तन्हा' करता है दुआ रोज़ रब से,


कोई  न हो वज्ह आज़माने  की ।



 मोहसिन तन्हा
डॉ. मोहसिन ख़ान
सहायक प्राध्यापक हिन्दी 
जे.एस.एम. महाविद्यालय
अलीबाग (महाराष्ट्र) 402201

09860657970     khanhind01@gmail.com

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