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'सर्वहारा' में हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में साहित्य की किसी भी विधा जैसे- कहानी, निबंध, आलेख, शोधालेख, संस्मरण, आत्मकथ्य, आलोचना, यात्रा-वृत्त, कविता, ग़ज़ल, दोहे, हाइकू इत्यादि का प्रकाशन किया जाता है।

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

आलेख

आंदोलनों, विमर्शों और गुटों से मुक्त हो साहित्य
डॉ. मोहसिन ख़ान
अभी कुछ समय पहले से हिन्दी साहित्य में आंदोलनों और विमर्शों का एक ज्वार उठा और उस ज्वार के तहत साहित्याकाश में या तो ज़बरदस्ती या फ़ैशन के तौर पर या एक होड़ में कई रचनात्मक तथा आलोचनात्मक कृतियों की उछाल देखी गई है। ऐसे आंदोलनों में दलित विमर्श, नारी विमर्श, सांप्रदायिक विमर्श, मुस्लिम विमर्श आदिवासी विमर्श इत्यादि विमर्श केंद्र में रहे, परंतु वे सब केवल विमर्श और सेमिनार के विषय बनकर ही रह गए उनसे समाज का कोई चेहरा न बदला अंतत: रचनाकार अब इस विमर्शों से तंग आकार थकने और ऊबने लगे तो स्वर सुनाई देने लगा कि अब यह विमर्श बंद किए जाएँ। स्वयं नामवर सिंह ऐसा कहते हैं यह बात उन्होंने कई बार कई स्थलों पर की है, लेकिन इस लीक पर अब भी बहुत से साहित्यकार अपने को घिसटते हुए चला रहे हैं और गौरव का अनुभव कर रहे हैं। इन विमर्शों और आंदोलनों से उन्होंने अपना उल्लू बख़ूबी बड़ी चालाकी से सीधा कर लिया और खूब प्रसिद्धि भी पाई। लेकिन ग़ौर करने कि बात यह है कि आचरण और भाषण में कोई साम्यता उनके व्यवहार में नहीं देखी जा सकती है। आज भी दलित विमर्श की दो धड़ों (दलित लेखक और गैर दलित लेखक) को किसी वास्तविक दलित से न तो कोई सरोकार है और न ही उसकी व्यावहारिक हित-चिंता। ऐसा ही नारी विमर्श के साथ है, मंच पर पूरी स्वतन्त्रता से बोलने वाली/वाला रचनाकार अथवा आलोचक अपने परिवार या संबंधियों के प्रति सचेत है कि अधिक नारी स्वतन्त्रता किस प्रकार घातक है। जहां वह मंच से पुरज़ोर पुकार लगा रहा है नारी स्वतन्त्रता की, वहीं वह घर में जाकर निषेध की भूमिका अदा कर रहा है। मेकअप किए सोने से लदी-फदी महिलाएँ आदिवासी स्त्रियों की चिंताएँ ज़ाहिर कर रही हैं। मुस्लिम विमर्शों को ग़ैरमुस्लिम सांप्रदायिकता सद्भाव के तहत चला रहे हैं और भीतर से अब भी उतने ही विषैले बने हुए हैं। यह सब देखकर सिर चकरा जाता है कि साहित्य का इतना लाभ उठाकर ये लोग साहित्य का किस प्रकार भला कर सकते हैं। साहित्य की राजनीति तो जगज़ाहिर ही है कि किस प्रकार गुटों और दलों का विभाजन हो गया है और दुर्ग द्वार पर रक्षक तैनात करते हुए दुर्ग की रक्षा की जा रही है। साथ ही साहित्य की सत्ता का भी हस्तांतरण जारी है। कहने का अभिप्राय यह है कि आज एक साहित्यकार दोहरे छल-छद्म की भूमिका अदा करते हुए आत्म-मुग्ध है और अपने पट्ठों को भी पाल रहा है। वर्तमान में हिन्दी साहित्य में बाज़ारवाद की दुहाई देकर बाज़ार को हेय, अनुपयोगी, घातक और विनाशकारी सिद्ध करते हुए उसे एक प्रेत के रूप में चित्रित किया जा रहा है। रचनाकार और आलोचक अपनी चिंताओं में इस बाज़ार को कोस रहे हैं उसे एक भयानक वस्तु बता रहे हैं, परंतु सचाई यह है कि वह स्वयं इस बाज़ार की चपेट से मुक्त नहीं हैं और दूसरों को मुक्त करने का बीड़ा उठाए हुए हैं। मेरा प्रश्न यही है कि क्यों एक रचनाकार इतनी दोहरी भूमिका का निर्वाह कर रहा है? वह स्वयं बाज़ार से गुज़रते हुए बाज़ार की चमकदार वस्तुओं को देखकर ललचा रहा है और अवसर आने पर नि:संकोच उसे प्राप्त भी कर रहा है। बाज़ार के इस शोर में मुझे कुछ और भी सकारात्मक  सुनाई दे रहा है। वह यह है कि बाज़ार आज की शक्ति बनकर उभरा है, उसने प्रतिस्पर्धा में नई उन्नत वस्तुएँ भी प्रदान की हैं और जीवन को सरल, सहज भी बनाया है। बाज़ार की अपनी एक शक्ति है और सभ्यता अर्थ केन्द्रित होने के कारण बाज़ार का निर्माण और संचालन करती है तथा करती रहेगी। सारे उत्पाद उद्योगों से निकलकर सीधे घर नहीं आ जाते, उपभोक्ता तक पहुँचने का मात्र माध्यम बाज़ार ही है। बाज़ार कोई आज की संकल्पना तो नहीं है, हाँ आज बाज़ार विकसित होते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया है। आज भारत और उसके नागरिक के समक्ष चुनौती भी है और अवसर भी हैं, अब उसे निर्णय लेना है कि चुनौतियों के रहते कैसे अवसर का लाभ ग्रहण किया जाए। यहाँ हिन्दी के साहित्यकारों ने बाज़ार का ऐसा रूप गठन किया है कि अब बाज़ार को लेकर कुछ रचना साहित्यिक फ़ैशन बन गया है। जो रचनाएँ सहज जीवन की बात करें उन पर अब बलात रूप से किसी न किसी विमर्श को जोड़ा जा रहा है या बाज़ार के नाम के हवाले किया जा रहा है। साहित्यकार बाज़ार का लाभ बराबर उठा रहा है परंतु अपनी कृतियों में निरंतर उसके अपयश को लेकर सक्रिय और सजग है। इधर भूमंडलीकरण को लेकर तो साहित्य एकदम नकारात्मक भूमिका का निर्वाह करते हुए भूमंडलीकरण को एक विदेशी भूत की संज्ञा दे रहा है। भूमंडलीकरण के सकारात्मक पक्षों की कोई चर्चा नहीं कर रहा है। साहित्यकार यदि इसका विरोध कर रहा है तो इसके विकल्प को क्यों नहीं प्रस्तुत कर रहा है। विकल्पों की खोज पहले करनी चाहिए और फिर उसका विरोध करना उचित होगा। यदि आप किसी को ख़ारिज कराते हैं, तो आपके पास स्थापना क्या है और उस स्थापना में कितने प्रतिशत विश्वसनीयता और विकास का लक्षण है। मेरा मत यह है कि साहित्य को किसी ढर्रे, आंदोलन, विमर्श, गुटों पर सक्रिय करने की बजाए उसे जीवन से सहज स्फुरित किया जाए, उसे मानवीय संवेदना से गहरे स्तर पर जोड़ा जाए ताकि साहित्य में जीवन का अब विलग स्वर भी सुनाई दे। हर कहानी, कविता, उपन्यास को बड़ी चालाकी के साथ विमर्शों से, आंदोलनों से, बाज़ार से जोड़ दिया जाता है, रचनाकर भी यह मान लेता है कि यह कृति/रचना साहित्यिक धरातल पर चल निकलेगी और आलोचक तो इसी प्रतीक्षा में बैठे है कि इन उपकरणों को कब काम में लाया जाए। आलोचक अपनी समस्त लेखन शक्ति लगाकर उसे वर्तमान में चल रहे आंदोलनों से जोड़ देता है और अपने कर्म की इतिश्री समझ लेता है। जिस तरह से साहित्य में गुटों का निर्माण हो गया है उससे रचनात्मक ऊर्जा, दृष्टिकोण और विभिन्न आयामों को सीधा-सीधा नुकसान है, यह बात साहित्यकार समझ नहीं पा रहे हैं। देखने में आया है कि आधुनिक काल की शुरुआत से है हिन्दी साहित्य नकल और ढर्रे पर चला, हमारी नवीन विधाओं के आविर्भाव की पृष्ठभूमि में पश्चिम के साहित्य की विधाओं की नकल की गयी। कई वादों को भी यहाँ देखा जा सकता है चाहे भारत की परिस्थितियाँ रही हों या न रही हों वैसा साहित्य यहाँ अनुकृति के आधार पर रचा गाय जैसे- अस्तितत्ववादी साहित्य, उत्तरआधुनिकतावादी साहित्य। अस्तित्ववाद की उपज और उसके साहित्य के पदार्पण का कारण प्रथम और द्वितीय विश्व-युद्ध के प्रभाव की उपज था, जिससे भारत बहुत अधिक प्रभावित न हुआ और न ही उसने सीधे-सीधे युद्ध में हिस्सा लिया। तब तो भारत उपनिवेशवाद से गुज़र रहा था, पश्चात में वह अस्तित्ववाद से प्रभावित होता है और साहित्य में अभिव्यक्ति प्रदान करता है। यह अभिव्यक्ति तात्कालिक न होकर पश्चिम की नकल पर कई वर्षों बाद प्रारम्भ की गयी। अब ऐसा ही उत्तरआधुनिकतावाद के साथ हो रहा है। साहित्यकार ज़बरदस्ती उत्तरआधुनिकतावाद को भारत में धकेल लाये और अंधाधुंध रूप से उत्तरआधुनिकतावाद का गीत गाना प्रारम्भ कर दिया, जबकि भारत अभी आधुनिकतावाद की प्रक्रिया से ही गुज़र रहा है और साहित्यकारों ने आलोचना में और रचनात्मक साहित्य में अपना योगदान आँख मूंदकर देना प्रारम्भ कर दिया। जिस तरह से साहित्य को साहित्यकार जो रूप दे रहे हैं वह वास्तव में प्रगतिशील कम और अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाला अधिक दिखाई दे रहा है। जबकि वास्तव में होना ऐसा चाहिए कि साहित्यकार चौकन्ना होकर समाज के भीतर धँसे और सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक टकराहटों को खोज निकाले और मानवीय जीवन की दुर्दशा, अत्याचार, संघर्ष, शोषण का यथार्थ चित्र अंकित करे। यदि वह ऐसा करता है तो ही साहित्य की सार्थकता, उचितता और उपयोगिता को निश्चित कर पाएगा वरना विमर्शों की आड़ में वह लेखन करता रहेगा और आनेवाले समय में नई पीढ़ियाँ उसे कालजयी साहित्य की श्रेणियों में कभी स्थापित न करेंगी और साहित्य कचरा बनकर रह जाएगा। इसलिए बहुत ज़रूरी हो जाता है कि लेखक अपनी मौलिकता को पहचानते हुए उस दिशा में आगे बढ़े जहां से वह मानव और उसके जीवन का वह रूप चित्रित कर सके जिससे उसके जीवन में बदलाव आने के साथ विकास की दिशा भी तय कर सके। भले ही साहित्य जीवन को सीधे तौर पर बदल न सके, लेकिन उस बदलाव की ओर संकेत तो कर ही सकता है।     
 
डॉ. मोहसिन ख़ान
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष
एवं शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय,
अलीबाग, ज़िला रायगढ़ (महाराष्ट्र) 402201

  मोबाइल – 09860657970         

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

15 कहानियों की परख

४. इरा टाक 

कहानी - फ्लर्टिंग मेनिया 
पाठक संख्या : १९३१३ 
फ्लर्टिंग मेनिया
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यह एक प्रेम कहानी है, इस कहानी का ताना-बाना युवा प्रेम को लेकर बुना हुआ है, एक पक्ष पूरा प्रेम को समर्पित है, वहीँ दूसरा पक्ष फ्लर्टिंग में विशवास करता है। वर्तमान समय में फेसबुक के माध्यम से जिस प्रकार से फ्लर्टिंग की जा रही है, उसमें लड़कों द्वारा बहुत अधिक मात्रा में इसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। लेखिका ने पूजा और विक्रांत के प्रेम को लेकर फेसबुक के माध्यम से प्रेम के विशवास को परखने की कहानी को रचा है, जो कहानी अपने साधारण रूप को लेकर सामने आती है। एक तरफ विक्रांत है जो कि एक कंपनी में विज्ञापन के कार्य में संलग्न है, दूसरी तरफ पूजा है जो कि जर्नलिस्ट है, पूजा प्रेम में विशवास रखती है और विक्रांत फ्लर्टिंग में विशवास रखता है। विक्रांत इसी नाते बदनाम भी है और पूजा को कई लोगों ने चेतावनी भी दी है कि विक्रांत तुम्हारा उपयोग करके छोड़ देगा, लेकिन पूजा उसे प्रेम करती है इसलिए उसके प्रति सनुभूति का रवैया रखती है और उसे अपने प्रेम पर विशवास है। पूजा विजया के कहने पर विक्रांत को परखती है कि क्या विक्रांत फ्लर्टिंग में विशवास रखता है? इसलिए वह फेसबुक पर एक अपना अकाउंट शिवाली के नाम से बनाती है और उसके साथ फ्लर्ट करने लगती है। समय के साथ फ्लर्ट चलता है और विक्रांत को यह पता नहीं रहता है कि पूजा ही शिवाली है, फेसबुक के माध्यम से एक सुबह विक्रांत शिवाली से चेटिंग के माध्यम से उसके फोन नंबर का आग्रह करता है लेकिन शिवाली फोन नंबर नहीं देती है और कहती है कि पहले वह उससे मिलेगी उसके बाद ही अपना फोन नंबर देगी। मिलने का समय तय होता है, अपने ऑफिस का काम ख़त्म करके विक्रांत एक रेस्तरां में शिवाली की प्रतीक्षा करता है, तब ही वहां पूजा अपनी सहेली विजया को लेकर रेस्तरां में दाखिल होती है और फिर विक्रांत का सारा भांडा फूट जाता है। कहा-सुनी के बाद पूजा विक्रम से नाराज़ होकर अपने रूम पर लौट जाती है। विक्रांत उसकी नाराज़गी से आहत होता है और मन ही मन वह आभास करता है कि गलती उसी की है। उसे पश्चाताप होता है, वह पूजा को फोन लगाता है, वह फोन नहीं उठाती है, अपने एक्सीडेंट की खबर मेसेज से देता है तो पूजा समझ जाती है कि खबर झूठी है। अपने एक मित्र राजेश को बीच में डालकर पूजा से मिलाने का आग्रह करता है, पूजा से मिलने के अवसर को राजेश पुख्ता बनाने के लिए उसे प्रेम का नुस्खा देता है कि उसके लिए हीरे की अंगूठी लेजाना। राजेश के कहने पर विक्रांत वैसा ही करता है और पूजा के सामने अपने विवाह का प्रस्ताव रखते हुए उसे अंगूठी पहना देता है। यहीं कहानी का अंत हो जाता है।

इस अंत के साथ ही कहानी अपनी साधारण अवस्था को लेकर हमारे समक्ष उपस्थित होती है, इस कहानी में ऐसी कोई भी विशेषता नहीं है, जिसके माध्यम से कोई सामाजिक पहलू या उसके किसी आयाम को रेखांकित किया जाए, यह एक हलके फुल्के मनोरंजन के लिए लिखी गयी प्रेम कहानी है, पाठकों की संख्या १९३१३ दर्ज की गयी है, वह केवल और केवल कहानी के शीर्षक के आकर्षण को लेकर ही बन पाई है, कहानी में ऐसी कोई भी विशेषता नहीं कि वह इतने पाठकों के बीच प्रसिद्द हुई हो। कहानी का कहनपन अत्यंत साधारण और अपरिपक्व सा है, जिसे साधारण कहानी की कोटि में रखा जा सकता है। ऐसी कहानियां साधारण पत्रिकाओं में अक्सर पढ़ने को मिलती हैं या अखबार में प्रकाशित की जाती हैं। कहानी जैसी गंभीर विधा में यह कहानी अपना कोई स्थान नहीं रख पाएगी, क्योंकि इसमें समाज की कोई गंभीर समस्या, घटना, मुद्दा आदि तो है ही नहीं बस साधारण सी फिक्शन वाली प्रेम कथा को आधुनिक समय की भाषा में बुना गया है, इस कहानी की भाषा अभी की पीढ़ी की भाषा का प्रतिनिधित्व करती है साथ ही वर्तमान युवाओं की जीवन शैली को भी रेखांकित करती है। कहानी का अंत बड़ा ही साधारण हुआ है, कहानी पढ़ते समय ही मध्य में पाठक अंदाज़ा लगा लेता है कि इसका अंत क्या होने वाला है। कहनी का प्रारंभ, मध्य और अंत एकदम साधारण है, पात्रों के चरित्र के विश्लेषण की स्थिति इस कहानी में बन ही न पाएगी क्योंकि यह कहानी उस स्तर कि है भी नहीं जो पत्रों की किसी विशेषता को दर्शा पाए। बिना किसी वातावरण के कहानी सरपट दौड़ती है और अपने अंत को छू लेती है। संवादात्मक तौर पर कहानी में संवादों की स्थिति होना कहनी की मांग है, जिसका अवश्य निर्वाह हो पाया है इसी संवादात्मकता पर सम्पूर्ण कहानी में कसाव बना हुआ है, विषय की दृष्टि से कहानी कोई भी अपना कमाल नहीं दिखा पाती है। मुझे आश्चर्य है कि इतने पाठकों की संख्या दर्ज दिखाई देती है यह केवल उस शीर्षक को क्लिक करने के कारण ही बन पाई है।

मूल कहानी इस लिंक http://www.pratilipi.com/blog/4565453695352832 पर पढ़िये।

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©डॉ.मोहसिन ख़ान
हिन्दी विभागाध्याक्ष एवं शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय,
अलीबाग – 402 201
(महाराष्ट्र)      

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

15 कहानियों की परख

 धीरेन्द्र अस्थाना (मुंबई)         क्रमांक 3

कहानी - 'उस रात की गंध' 
पाठक संख्या : 20280
धीरेन्द्र आस्थाना की कहानी ‘उस रात की गंध’ कहानी के स्तर से और कहन के स्तर से पहले की दो कहानियों की परख से कहीं श्रेष्ठ कहानी सिद्ध होती है। कारण इसका यह है कि विषय की दृष्टि से यह कहानी यथार्थ से एक मनोलोक की ओर ले जाती है, साथ ही यह कहानी बाहर से भीतर का प्रवेश कराती है। कहानी कई स्तरों पर फिट बैठती है, चाहे उसमें रूपकों का इस्तेमाल हो, चाहे चित्रात्मकता हो या बिंबों के माध्यम से सजीवता हो। हर प्रकार से कहानी की परख में यह कहानी अपने निजी और स्वतः रूप मे श्रेष्ठ सिद्ध हो जाती है। कहानी मुंबई शहर के उस मुखौटे को नोचकर अलग हटाती है, जिसे आम आदमी मुंबई को देखकर मतिभ्रम में पड़ा हुआ है कि- मुंबई मेरी जान!!! लेकिन इस चमक-दमक भरे शहर के आकर्षण और सपनों की साकारता की दुनिया के पीछे एक ऐसी दुनिया पनपी हुई है, जिसे देखकर हताशा, ऊब और कसेलापन ही हाथ लगता है। मुंबई में चोरी छिपे चल रहे अनियंत्रित देह व्यापार की हकीकत सामयिक यथार्थ को कहानी का प्लाट देती है, लेकिन इसके पीछे गरीबी मुख्य कारक बनकर उभरी है और जिसे लेखक ने बड़ी ही सौंदर्यपूर्ण शैली में उद्घाटित कर दिया है। कहानीकार भी पहले मुंबई के आकर्षण में गिरफ्त है और लगातार गिरफ्त ही रहता है, उसका भ्रम तब टूट जाता है जब वह जीवन की कटु सत्यता से टकराता है और देखता है कि शरीर, हवस, सौंदर्य और आकर्षण से भी अधिक कोई असरकारक स्वाद है, तो वह ज़हर जैसी ज़िंदगी का असर है और उस असर में एक कड़ुआपन गरीबी का घुला हुआ है।
कहानी का गठन इतना सहज और ज़ोरदार है कि कहानी पाठक के सामने बहती है और पाठक एक ही सांस में कहानी में डूबकर उसे पी लेता है, कहानी में कहीं भी व्यावधान या अनुत्तरित प्रश्न नहीं छूटते हैं। यही एक बेहतर कहाई और कहानीकार की निशानी है। कहानी में आकर्षण के साथ कौतूहल बराबर बना हुआ है, जो कहानी को चरम सीमा पर लेजाकर पाठक को अपनी संपूर्णता में अंत की तरफ ले जाता है। कहानी में जो बिम्ब खींचे गए हैं, वह लाजवाब मानने चाहिए जैसे- “कोहरा आसमान से झर रहा था। हमेशा की तरह नि:शब्द और गतिहीन”, “वह लड़की गीले अंधेरे में चारों तरफ दूधिया रोशनी की तरह चमक रही थी”, “दूर तक कई कारें एक-दूसरे से सम्मानजनक दूरी बनाए खड़ी थीं – मयखानों की शक्ल में” ऐसे बिम्ब कहानी को और भी अधिक स्पष्ट करने के साथ कहानी में नए प्रयोगों की संभावना को बड़ा देते हैं। अंतिम के बिम्ब में आस्थाना जी ने यथार्थ को ऐसी शक्ल दी है जिसे मुंबई के उस इलाके के लिए जहां कथा आकार ले रही है स्थायी बिम्ब के रूप में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त भाषा का जो प्रवाह है वह अपने आप में सहज और बहुत तरलता लिए हुए है। संवादों में मुंबई की भाषा का सहज भाव और टोन का इस्तेमाल कहानी को और भी गठन प्रदान करता है, संवादों का ऐसा जोरदार प्रयोग है कि पत्रों के मूड का भी पता देता है, उनके भीतर की चिढ़, आक्रोश और एक चिंता को अभिव्यक्त कर देता है। कहानी के लिए सबसे अधिक महत्व की बात यह है कि यह पाठकों में समाज के यथार्थ को अवगत कराने के साथ एक अनाम चिंता में डालकर मन में संवेदना पैदा करने के साथ एक बेचैनी भर देती है। कहानी में मार्मिकता है जो मानवी जीवन की छुपी हुई हकीकत को उजागर करती है। औरत की गंध का सबके लिए अलग अनुभव हो सकता है और उस गंध की बसाहट भीतर कहीं चिपक सी जाती है, जिसे समय रहते आदमी महसूस भी करता है। कहानीकार एक ऐसी तीखी विषाक्त गंध साथ लिए आता है, जिससे मन में ग्लानियुक्त हवस की उबकाई आजाए।

मूल कहानी इस लिंक http://www.pratilipi.com/blog/4565453695352832 पर पढ़िये।
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©डॉ.मोहसिन ख़ान
हिन्दी विभागाध्याक्ष एवं शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय,
अलीबाग – 402 201
(महाराष्ट्र)     

15 कहानियों की परख

 मृदुल पाण्डेय                क्रमांक 2

कहानी - 'चीनी कितने चम्मच' 
पाठक संख्या : २६७८४ 
मृदुल पाण्डेय की कहानी ‘चीनी कितने चम्मच’ भारत में पुरुषों की तथा भारतीय परिवार की मानसिकता में स्त्री के प्रति बाज़ारवादी रवैये को चोट पहुंचाती एक घटना को केन्द्रित करती लघु कहानी है। यह कहानी लघु है, लेकिन संदेशात्मक मारक क्षमता में कहीं कमी न आने पाई है, एक लड़की को किस प्रकार बाज़ार के तौर-तरीकों से परिवार के सदस्यों द्वारा विवाह के लिए पेश किया जाता है और उससे उसकी मानशा, चुनाव के अधिकारों से वंचित रखकर उसे नमूना एवं वस्तु से अधिक नहीं समझा जाता है। कहानी भारतीय रूढ़िवादिता से टकराती है और इस टकराव में एक प्रहार छिपा है, जो समय की मांग को पहचान रहा है, भारतीय रूढ़िवादिता की ज़मीन को कुरेद रहा है। कहनी भारतीय परिवार की उस दशा को चित्रित करती है, जहाँ बेटियों को बोझ समझा जा रहा है और बेटे की चाह में बच्चे पैदा करने का पुरुष हर बार चांस ले रहे हैं और विफल होने पर स्त्री जाति को दोष देते हुए, उनके प्रति हिंसात्मक व्यवहार करते रहना है। यह कहानी स्त्री जीवन की पीड़ाओं को व्यक्त करने के साथ उनकी आश्रितता, नई पीढ़ी के विद्रोह और आत्मनिर्भरता को भी दर्शाती है। नई पीढ़ी जिसे अनियंत्रित और अनुभवहीन समझकर सतही तौर पर लिया जाता है और उनके सपनों पर अंकुश लगाया जाता है। यह ऐसे अंकुशों को ढीला करते हुए, स्त्री मुक्ति की दास्तां का एक पृष्ठ रच रही है।


कहानी की शुरूआत एक उत्सुकता से हुई, लेकिन जहाँ नायिका रुचि मिश्रा जो बैंक ऑफ विमेन्स की ज़ोनल हैड है, उससे नायक का बातों की औपचारिक शुरूआत न दर्शाना कहानी में एक गैप पैदा करता है, जो कि कहानी का कमज़ोर हिस्सा बनता है और यहीं कहानी असहज सी दिखाई देती है। औपचारिकता को नज़रअंदाज़ करके सीधे नायिका के आंतरिक जीवन में प्रवेश कर जाना, मुझे लगता है यह कहानी को कुछ अधूरा सा बना रहा है एक गैप को रच रहा है। कहानी में ट्रेन के किस तरह के कोच में रिज़र्वेशन है? क्या वह स्लीपर क्लास है या AC का कोई कोच ? यह न दर्शा पाना कहानी को हवा में चलाने जैसा बना रहा है, क्योंकि कोच के आधार पर कहानी के वातावरण की रचना होनी थी, जो हो न पाई और इससे कहानी यथार्थ से गमन करती नज़र आती है। इस कहानी के आंतरिक गठन की एक कमी यह भी मान रहा हूँ कि ट्रेन के कोच की सीटों की स्थिति के विषय में और स्पष्ट हो जाता, तो बेहतर होता क्योंकि बगल वाली सीट दर्शाकर पूरी 8 सीटों में से ठीक सीट का संज्ञान पाठक नहीं ले पाता है कि किस सीट पर बैठकर कहानी चल रही है, उनकी अवस्था किस प्रकार की है? और अगल-बगल बैठे लोग क्या इनके संवादों के प्रति उपेक्षित हैं? अथवा रुचि ले रहे हैं? अक्सर होता यह है कि दो युवा विपरीत लिंगियों के प्रति न चाहते हुए भी यात्रियों की दृष्टि पड़ती ही है और उनकी बातों पर वे कान देते ही हैं। इस अवस्था से मुक्त यह कहानी लाउड संवादों की सृष्टि कर रही है, ऐसा लगता है बोगी में केवल वह दोनों ही हैं और कोई नहीं। यह एक रिक्तता कहानी को विच्छेदित करती है। कहानी के कहन के तौर पर एक अटपटी सी पंक्ति सामने आती है- “पेंट्री बॉय चाय दे गया था, चाय बनाते हुए अचानक मेरे मुँह से निकला।” मुझे लगता है पेंट्री बॉय बनी हुई चाय दे गया होगा, क्योंकि अक्सर ट्रेन में चाय डीप वाली मिलती है या बनी हुई। क्रियात्मक रूप में उसे चाय बनाना कभी नहीं कहा जाता है, उसे डीप करना कहा जाता है। कहानी केवल बात को कह देना भर मेरी नज़र में कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे वातावरण को उभार देना है, जिसमे कहानी अपनी सहज गति से चले और चित्रात्मकता आँखों के सामने ला दे, कई बिंबों का निर्माण करदे और पाठक को सजीव सी लगाने लगे। कहन के लहजे का भी अवसर कहानीकार को निकालना होता है, जो मूल कहानी को और भी पुख्ता करता है। ऐसी कहानी ही मन पर छाप छोड़ देती है। यह कहानी मन पर छाप छोड़ने की दृष्टि से सफल नहीं हो पाई है। कहानी का सीधे सीधे चलकर एक सदेश के रूप मे समाप्त होजाना कहानीकार कहानी के कहनीपन को रच न पाया। ये कहानी, कहानी के अंश को लिए हुए है, लेकिन कहानी के तौर पर कम नज़र आती है। कहानी की बुनावट आत्मकथात्मक शैली में है और सपाटबयानी के रूप में अभिव्यक्त हुई है। भाषा का गठन और प्रवाह पात्रानुकूल सा ही है, जो कहानी को सपाट बनाता है।

मूल कहानी इस लिंक http://www.pratilipi.com/blog/4565453695352832 पर पढ़िये।
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©डॉ.मोहसिन ख़ान
हिन्दी विभागाध्याक्ष एवं शोध निर्देशक
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(महाराष्ट्र) 

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

15 कहानियों की परख

वर्ष 2015 में बैगलुरु-कर्नाटक से Pratilipi.com ने घोषणा की है कि दस हज़ार से अधिक कहानियों में से 15 कहानियाँ ऐसी हैं, जो कि सबसे अधिक पढ़ी गई हैं और उनके पाठकों की (रेटिंग) संख्या के आधार पर उन्हे श्रेष्ठ माना जाए, ऐसा साफ तो नहीं लेकिन मन्तव्य यही है। पहले स्थान पर मुंबई की शील निगम की ‘रेपिस्ट’ कहानी है, जिसके पाठक 27259 हैं और यह संख्या निरंतर में बढ़ रही है। मैं कहानी की सफलता पाठकों द्वारा वेब पर पढ़ी गई संख्या के आधार पर मानूँ, कदापि संभव नहीं हो सकता है। सत्य तो यह है कि वेब पर पाठक जब सर्च करता है और सर्च के दौरान पृष्ठ खुलता है, तो अपने आप एक संख्या दर्ज हो जाती है। इसे पढ़ा जाना मानना बिलकुल भी प्रामाणिक नहीं है। होता यूं भी है कि कहानी का शीर्षक पाठक को आकर्षित करता है और पाठक उस कहानी पर क्लिक करता है, तो पढ़ा जाना मान लेना सही नहीं है। यह तकनीक का भी कमाल है और आपसी मानवी व्यवहार द्वारा बनाए गए सम्बन्धों का भी कमाल है कि सभी परिचितों को कहानी पढ़ने का संदेश भेजना और कहना कि मेरी कहानी इस वेब पर मौजूद है, कृपया पढ़ें, क्योंकि ऐसे संदेश लगातार मेरे पास भी आते हैं। फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सअप तथा अन्य मध्यमों के द्वारा यह कार्य बड़े आसान तौर पर किया जा रहा है, कुछ हाथ वेब साइट का भी मानता हूँ, जो पाठकों तक कहानी अथवा रचना की सूचना पहुंचाते हैं। एक बात और यहाँ कहूँगा कि यूं तो पाठक को किसी वर्ग में बंटा नहीं मानता, लेकिन तकनीक के आजाने और उसे अपनाने से पाठक दो वर्गों में विभाजित हो गया है, एक वह जो पत्रिकाओं, अखबार, पुस्तकों के माध्यम से कहानी/रचना पढ़ रहा है और दूसरा वह जो इंटरनेट और कंप्यूटर/मोबाइल का उपयोग करते हुए कहानी/रचना पढ़ रहा है। पाठकों की कहानी पढ़ने के संबंध में सही गणना करना दुष्कर है, सही गणना नहीं की जा सकती है। केवल आंकड़ों पर किसी कहानी को बहुत अधिक प्रसिद्ध मान लेना, कहानी विधा के साथ अन्याय कहूँगा। कारण यह है कि गद्य की सबसे सशक्त विधा कहानी है और इसके आंतरिक गठन, संवाद भाषा, पात्र, यथार्थ, सामाजिक सरोकार, परिदृश्य और समय-काल के विषय में अधिक चेतना होना आवश्यक मानता हूँ और इसपर अधिक ज़ोर देकर खुले मन से इस पर चर्चा करना भी आवश्यक मानता हूँ। एक बार रचनाकर ने अपनी रचना समाज को सौंप दी, तो वह समाज की हो जाती है, उसपर क्रिया-प्रतिक्रिया होना आवश्यक हो जाता है। मैं यहाँ कहानी की निंदा करने के उद्देश्य से कोई बात नहीं कहूँगा, बल्कि उसके आंतरिक गठन और सशक्तता-अशक्तता के विषय में विचार कर रहा हूँ। इन 15 रचनाकारों की कहानी को लेकर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें खुले मन से आलोचनात्मक ढंग से प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह प्रश्न केवल प्रश्न करने के लिए नहीं किए गए हैं या रचनाकार को किसी भी तरह की अपनी विद्वता दर्शाने के उद्देश्य से नहीं हैं और न ही उनकी कोई निंदा या रचनात्मक अपमान, के लिए किए गए हैं, बल्कि कहानी पर सार्थक संवाद के लिए किए गए हैं। सब कहानियों को लेकर प्रश्न करूंगा यह निश्चित नहीं है, इन 15 कहानियों में कुछ कहानी शिल्प को लेकर अद्भुत और आंतरिक गठन को लेकर अत्यंत सजीव भी हैं। हर रचनाकर का अपना दृष्टिकोण होता है और वह कई चीजों, अवस्थाओं से गुजरकर रचनाकार बनता है, इसलिए प्रत्येक रचनाकार अपने में विशिष्ट और विविधता लिए हुए है, इसी से रचना में भी विविधता कई स्तरों पर देखी जा सकती है।
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शील निगम (मुंबई)         क्रमांक 1        
कहानी -  'रेपिस्ट' 
पाठक संख्या : २७२५९ 
       
मुंबई की हिन्दी रचनाकार शील निगम की कहानी ‘रेपिस्ट’ कुल मिलाकर एक जीवन की दीर्घकाल की घटना को समेटी हुए एक अच्छी कहानी है, ‘रेपिस्ट’ की नायिका विमला है, जिसके जीवन को केंद्र बनाकर कहानी रची गयी है। ये कहानी एक कहानी के प्लाट की ही रचना करती है, जिसमें विमला के जीवन के 16 वर्ष बाद विवाह से लेकर उसकी आत्महत्या की एक कथा है, जो सपाटबयानी से तेज़ गति में चलती हुई तेज़ी से प्रभाव जमाकर समाप्त हो जाती है।  
कहानी विमला के बहुत बड़े जीवन को केंद्र को समेट रही है, जो कि एक लंबे जीवन की गाथा है, उसे यूं कहानी में बांधकर तत्परता और शीघ्रता से समाप्त कर देना कहनी के भीतर कई प्रश्नों को स्वतः उभर जाना है। भाषा के स्तर से कहानी सपाट बयानी की कहानी है जो पाठकों को कहानीपन का आभास जगाती है और साधारण सी बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। संवादों का इस्तेमाल पात्रों के अनुरूप है। रंजन, राजीव और राजन नाम भी भ्रम उत्पन्न करने वाले हैं जो पाठक को भ्रमित करते होंगे, कारण यह है कि ये तीनों नाम एक जैसे ही नज़र आते हैं थोड़ा सा अंतर है, कमला और विमला मैं भी यही स्थिति है। यह कहानी यथार्थ के धरातल पर सृजित कहानी  आधार पाकर रची हुई अधिक लग रही है। फिर भी कहानी का विषय स्त्री जीवन की उस दर्दनाक घटना का वर्णन करता है, जिसमें स्त्री को पुरुष वर्ग से बलात होने का अन्याय सहन करना पड़ता है। विमला ऐसे ही पात्र का प्रतीक है, जो हमारे देश में कई जगहों पर पाया जा सकता है। शारीरिक और मानसिक बलात किसी भी स्त्री को मौत के मुंह में आसानी से ले जा सकता है और ऐसी दु:खद घटनाएँ आम जीवन में लगातार हो रही हैं।

मूल कहानी इस लिंक http://www.pratilipi.com/blog/4565453695352832 पर पढ़िये।

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©डॉ.मोहसिन ख़ान
हिन्दी विभागाध्याक्ष एवं शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय,
अलीबाग – 402 201
(महाराष्ट्र)

बुधवार, 10 जून 2015

ग़ज़ल


लोग जाने कहाँ-कहाँ अपनी नज़र रखते हैं।
खुद  का पता  नहीं, सबकी ख़बर  रखते हैं।

मैं गिन रहा हूँ जेब में पैसे हैं कितने बाक़ी,
ये  दुकानवाले  हसरतें  सजाकर रखते हैं।

फ़िक्र है मुझको, इंतेज़ाम करने हैं और भी,
मुसीबतें आ लिपटीं, पाँव जिधर रखते हैं।

फ़ैसले किये ग़लत तुमने, तो दख़ल दी है,
तजुर्बे  कुछ  हम  तुमसे  बेहतर रखते हैं।

'तनहा' झुलस गया मैं तपती दोपहरों में,
और रोज़ वो मेरी राह में पत्थर रखते हैं।

©-मोहसिन 'तनहा'

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

ग़ज़ल

सच्ची झूटी बातों का असर जानता है ।
आप के इरादों को बाख़बर जानता है ।

मसीहा न बनाओ वो क़ातिल है लोगों,
कब कहाँ फैलाना है क़हर जानता है ।

पहने हैं उसने मुखौटे हर वक्त नए-नए,
लिबासों को बदलने का हुनर जानता है ।

बुझ गई प्यास बस तुम्हें इतना है पता,
घोलना है किस वक्त ज़हर जानता है ।

फैलाकर फंदे डालकर दाना छुप गया है,
किस परिंदे की है बारी शजर जानता है ।

डालकर जाल इतमिनान से सो जाता है,
कहाँ फँसेंगी मछलियाँ लहर जानता है ।

'तन्हा' बदलता रहा करवटें रात भर,
मेरा दर्द बस मेरा बिस्तर जानता है।

             
मोहसिन 'तन्हा'
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दौर है चुनावों का तो कितने होशियार हैं।
पूछते हैं पास तुम्हारे कितने हथियार हैं।

लो मेंढकों को भी अब क़त्ल का हुआ डर,
सोचते हैं जंगल में हम ही एक शिकार हैं।

सरहद की  हिफ़ाज़त  में बहाया है लहू,
हम न तुम्हारी तरह मुल्क़ के ग़द्दार हैं।

आज माँगा है हिसाब तो सब चुकाते हैं,
तुम पर तो  हमारे कितने ही उधार हैं।

'तन्हा' लेता है सांसें ज़हरीली फ़िज़ाओं में,
कैसे हो तीमारदारी यहाँ तो सब बीमार हैं।

                 मोहसिन 'तन्हा'
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क्यों उन्मादियों में फैला हिन्दुत्व का सुरूर है।
गर मैं मुसलमान हूँ तो मेरा क्या क़ुसूर है।

ये जो घोल रहे हैं दिलों में नफ़रतों का ज़हर,
दरिंदों की दरिंदगी का ही बस फ़तूर है।

किसी मज़हब की रवायत से क्यों हो एतिराज़,
तरीक़े हैं जुदा पर इंसानियत तो ज़रूर है।

पढ़ो इतिहास और शहीदों की फ़ेहरिस्त भी,
फ़िर कैसे मेरी कौम मुल्क़ के लिए नासूर है।

क़ायम होता हो अम्न और ख़ुलूस मुल्क़ में,
तो हो जाए जिस्मों जाँ क़ुर्बान मुझे ग़ुरूर है।

'तन्हा' का अहद है लड़ता रहेगा तबतक,
जबतक इस दुनिया में क़ायम फ़ज़ूर है।

            मोहसिन 'तन्हा'