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'सर्वहारा' में हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में साहित्य की किसी भी विधा जैसे- कहानी, निबंध, आलेख, शोधालेख, संस्मरण, आत्मकथ्य, आलोचना, यात्रा-वृत्त, कविता, ग़ज़ल, दोहे, हाइकू इत्यादि का प्रकाशन किया जाता है।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

लेख-साहित्य को खोखला कर रहे...विमर्श के सरोकार !

रचनाकार का परिचय
डॉ. अनवर अहमद सिद्दीकी 

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा अनुवाद अध्ययन विभाग  में सहायक प्राध्यापक 26 वर्षों का शैक्षणिक अनुभव,  विश्वविद्यालय कार्यपरिषद के सम्मानित सदस्य, विश्वविद्यालय के विद्या परिषद् पूर्व सदस्य, विश्वविद्यालय के, विविध महत्वपूर्ण समितियों के सदस्य, पूर्व संयोजक- राष्ट्रीय सेवा योजना, संयोजक- अमन मानव मिशन।
देश-विदेश में अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय सेमीनार, सम्मेलन, कार्यशाला, संगोष्ठी में उद्घाटक, अतिथि विद्वान, बीज वक्तव्य,विशेषज्ञ आदि के रूप में सक्रिय भागीदारी विश्व हिंदी सम्मेलन न्यूयार्क (अमेरीका) अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी बैंकॉक (थायलैंड), प्रथम अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस लाहौर (पाकिस्तान) आदि में आलेख वाचन
राजभाषा हिंदी कार्यशालाओं में केंद्र सरकार के उपक्रमों, कार्यालयों, संस्थानों में विषय-विशेषज्ञ, विविध वादविवाद ,निबंध, कविता आदि स्पर्धाओं एवं प्रतियोगिताओं के निर्णायक, मंचीय समारोह में कुशल मंच संचालन, ग़ज़ल,काव्य, आध्यात्मिक व्याख्यान, संभाषण, नाट्य लेखन, अभिनय, निर्देशन, 
विविध पत्रिकाओं का सम्पादन, पुस्तक लेखन- अनूदित हिंदी नाटक :एक रंग दृष्टि, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, पुस्तक अनुवाद- आध्यात्मिक बोधामृत :गुप्त संजीवनी पुस्तक/पत्रिका संपादन: बहुवचन, पुस्तक वार्ता, निर्मल विमर्श, राह राहुल की...,मोहन से सम्मोहन...,अर्थ सन्देश, दी ज्वेल आदि 
साहित्यिक आयोजनों एवं गतिविधियों में विशेष अभिरूचि, अनुवाद एवं प्रशासनिक हिंदी कार्य-क्षेत्र आदि 
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संपर्क-निवास :
अमन कुटीर, गांधी नगर, वर्धा 442 001

मोबाइल- 9325469246 (निवास) फोन- 07152-247836
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              साहित्य को खोखला कर रहे... विमर्श के सरोकार !
आज के समय में साहित्य की जितनी हानि विमर्शों से हुई है, शायद ही उतनी हानि किसी अन्य दृष्टिकोण से हुई हो... वैसे विमर्श किसी एक पक्ष, वर्ग, जाति, विचार, लिंग, सम्प्रदाय आदि का प्रतिनिधित्व करता है... विमर्श का मुख्य उद्देश्य किसी एक वर्ग या श्रेणी विशेष की दबे, उपेक्षित और तिरस्कृत स्वर को मुखरित करते हुए निराकरण करना है... जबकि साहित्य का प्रयोजन काफ़ी फैला हुआ है... साहित्य की परिधि वृहद है... साहित्य की दृष्टि व्यापक है... साहित्य का फ़लक विस्तृत है... लेकिन विडम्बना है कि आज विमर्श ने साहित्य को विविध रंगों में, दुकानों में, प्रदर्शनियों में, खेमों में, वादों में और समुदायों आदि में विभक्त कर दिया है... जिसके कारण यह देखा गया है कि साहित्य में पूर्वाग्रही, संकीर्ण और संकुचित दृष्टि को अवसर मिला है... परिणामतः हाल ही के वर्षों में साहित्य में तेज़ी से कट्टरता फैली है... उसी तरह जो साहित्य समाज का दर्पण कहलाता था, जिस दर्पण में समाज का प्रतिबिंब दिखाई देता था, आज ऐसा साहित्य समाज का विभाजक बन कर रह गया है। 
      आज समाज को हम विविध खेमों में, वर्गों में और विचारों आदि में बंटा देख रहे हैं... आजकल विभिन्न प्रकारों के विमर्शों ने साहित्य का बेड़ा गर्क करके रख दिया है... एक तरह से देखा जाए तो आज साहित्य को विभिन्न प्रकार के विमर्श दीमक की भांति खोखला कर रहे हैं... जिसके कारण साहित्य को पोषित करने वाले मूल्यों का भी तेज़ी के साथ विघटन अर्थात अमूल्यन हो रहा है... विमर्श के कारण साहित्य में वर्णित कई तरह की मान्यताएं टूट रही हैं. साहित्य के प्रतिस्थापित मानदंड शिकस्त होते जा रहे हैं... मानो ऐसा लगता है, जैसे आज विमर्श के समक्ष साहित्य का अस्तित्व या साहित्य की अपनी अस्मिता को खो रहा है... उसी तरह आज साहित्य के क्षेत्र में विमर्श ने तो विकराल स्थिति उत्पन्न कर दी है, जिससे कि साहित्य विमर्श के समक्ष स्वयं को दोयम दर्जे का अनुभूत करने लगा है... कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है, जैसे विमर्श ने साहित्य से परे अपनी एक विशिष्ट पहचान बना ली है। 
      सचमुच आज साहित्य विमर्श के सामने असहाय, पंगु और बौना साबित हो गया है... विमर्श ने साहित्य में सिकुड़न की स्थिति उत्पन्न कर दी है... फलतः साहित्य का उदार और मानवीय चेहरा एकाएक नदारद हो गया... जिससे साहित्य लोकोन्मुखी एवं समाजोन्मुखी होने की बजाय व्यक्ति-विशेष, स्व-केंद्रित अथवा किसी एक विशिष्ट-वर्ग का स्वर बनता जा रहा है. जबकि साहित्य का लक्ष्य किसी एक विचार पर ठहर जाने के बजाय समस्त लोक या सर्वहित की समस्याओं को उजागर करते हुए उपयुक्त और अपेक्षित समाधान, निराकरण एवं निवारण प्रस्तुत करना है... खेद का विषय है कि आज बिना विमर्श के तथाकथित साहित्यकार भी अपनी कलम उठा पाने में स्वयं को अशक्त और हिचकिचाहट अनुभूत कर रहे हैं... आदर्शोन्मुख या साहित्यादर्श की बातें विमर्श के आगे बेमानी-सी लग रही है... जबकि साहित्य का विमर्श के बगैर भी सृजन हो सकता है... उसे विमर्श नामक किसी बैसाखी की आवश्यकता क्यों और किसलिए है ?
         सवाल उठता है कि क्या विमर्श के आने से पहले तक लिखा जाने वाला साहित्य वास्तव में साहित्य की कसौटी या मानदंड पर खरा उतरने वाला खरा साहित्य माना नहीं जाएगा या उसे स्वीकार नहीं किया गया या आज ऐसे साहित्य की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कोई प्रासंगिकता नहीं रह गयी है? क्या इससे पूर्व विमर्श के बिना जो साहित्य विपुल प्रमाण में रचा गया, ऐसा साहित्य विमर्श की अनुपस्थिति में खारिज़ किया जाने योग्य है ? दरअसल वह साहित्य समस्त विमर्शों को अपने भीतर समाहित किए हुए था... वह साहित्य समाज में निहित समस्त समस्याओं का चित्रण करते हुए उपयुक्त समाधान प्रस्तुत करने वाला एक जीवंत दस्तावेज हुआ करता था... कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि साहित्य को किसी विशेष वाद या विमर्श से देखा जाना या देखने की कोशिश करना बेमानी हो सकती है... ऐसा साहित्य केवल निजी स्वार्थ से उत्प्रेरित होकर लिखा जाने वाला साहित्य माना जा सकता है, जो केवल समाज में कटुता, ईर्ष्या, विद्वेष, हिंसा, घृणा आदि को बढ़ावा देते हुए अलगाव या विभाजन पैदा कर सकता है।
      दरअसल सच्चाई यह है कि साहित्य में विमर्श जिन उपेक्षितों, पिछड़े वर्गों, लिंगों, जातियों, सम्प्रदायों, धर्मों आदि के सरोकारों को लेकर स्थापित किए गए या किए जा रहे हैं, आश्चर्य की बात है कि आज उस वर्ग-विशेष को इन विविध विमर्श के स्थापित होने से प्रत्यक्ष कोई लाभ नहीं हो पा रहा हैं... बल्कि उस वर्ग-विशेष की समस्याएं जस की तस बनी हुई है... उनमें विमर्शों के शोर-शराबे का कोई असर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा हैं... इस सत्य की पार्श्वभूमि में जो वास्तविकता है, वह भी कम चौकाने वाली नहीं है... वास्तव में विमर्श के नाम पर दूकानदारी करने वाले तथाकथित साहित्यकारों का वर्ग समूह उन्हीं के द्वारा स्थापित विमर्श को उसी अवस्था अथवा दशा में बनाए रखना चाहता है... वे उन समस्याओं का समाधान जानबूझकर होने देना नहीं चाहते हैं... संभवतः विमर्शों के स्वामी, जनक अर्थात पुरोधा विमर्श के समाधान हो जाने की स्थिति में विमर्श का कोई औचित्य न रह जाएगा... जिससे तथाकथित विमर्श के नाम पर हो-हल्ला कर साहित्यरूपी दूकान से अधिकाधिक लाभ अर्जन किया जाए  शायद यह सोचकर विमर्श को यथा बनाए रखने में अधिक विश्वास और संतोष अनुभूत कर रहे हैं।
         साहित्य के नाम पर विमर्शों की राजनीति करने वाले तथाकथित साहित्यकार बनाम राजनीतिक विमर्श का निराकरण कतई होने नहीं देना चाहते हैं... ठीक उसी प्रकार जैसे अल्पसंख्यकों के रहनुमा अक्सर चुनाव क़रीब आने के समय मज़हब या जाति के नाम पर आसानी से बिक जाया करते हैं... ऐसे रहनुमा मज़हब की समस्याओं को भुनाकर अपनी रोटी आसानी से सेंकना चाहते हैं... यदि इन समस्याओं का निराकरण करने वाला अगर कोई रहनुमा या प्रतिनिधि (जो कूटनीतिक और अवसरवादी न हो) नि:स्वार्थ या अनायास प्रकट होकर सामने आ भी जाय तो वे तथाकथित धर्मों के ठेकेदार एक साथ मिलते हुए आपसी विरोधों को भुलाकर उसे रास्ते से हटा देने में ही अपनी भलाई समझते हैं... जिसके कारण उस हाशिए के समाज की समस्याएं हमेशा-हमेशा के लिए पूर्ववत बनी रहती है... ठीक उसी तरह साहित्य में आज विमर्श केवल स्वांग रचने के लिए स्थापित किए जाते रहे :हैं... ताकि उस वर्ग-विशेष की दयनीय स्थिति को भोग कर तथाकथित विमर्श के नाम पर जीवनपर्यंत मलाई और दलाली खायी जा सकें।
    आज विमर्शों के बहाने कई तरह से पूर्वाग्रहों पर आश्रित हथकंडे और राजनीति की जा रही है... निरापद सिद्धांतों और वादों को ज़बरदस्ती थोपने का कार्य किया जा रहा हैं... आज विमर्शों की पार्श्व में कहीं भी बौद्धिकता या विवेक नज़र नहीं आ रहा, बल्कि ऐसा लगता है कि विमर्श को लेकर दिमागी कसरत का आखाड़ा बनाया जाने लगा हैं... विमर्श आपस में युद्ध की पूर्व तैयारी का सूचक हो गए हैं... विमर्श के अस्तित्व को जीवंत बनाए रखने के लिए आधारभूमि के रूप में विमर्श-मठ स्थापित किए जा रहे हैं... जहाँ विमर्श की धार को अधिक तीक्ष्ण बनाया जा सकें... ज़ाहिर है जब मठ होगे तो मठाधीश ख़ुद अवतरित होगे... ऐसी स्थिति में विमर्श केवल स्वांत: सुखाय और स्वार्थ सिद्धि के प्रयोजन से परे कुछ नहीं... आश्चर्य है कि विमर्श जिस वर्ग, समाज, विषय, समस्या या विचार को लेकर प्रारंभ हुआ वही वर्ग विमर्श के केंद्र से नदारद है... केवल विमर्श की राजनीति करनेवाले प्रबुद्ध साहित्यकारों ने जितना विमर्श शब्द का इस्तेमाल कर, साहित्य के साथ कुठाराघात किया है, शायद ही उतना किसी ने किया हो और यह सब-कुछ विमर्श के नाम पर...। 
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ये लेखक के अपने विचार हैं, जिससे सहमत-असहमत हुआ जा सकता है। (संपादक-सर्वहारा)     

ग़ज़ल

रचनाकर का परिचय- डॉ. राकेश जोशी
डॉ. राकेश जोशी

अंग्रेजी साहित्य में एम. ए., एम. फ़िल., डी. फ़िल. डॉ. राकेश जोशी मूलतःराजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड में अंग्रेजी साहित्य के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इससे पूर्व वे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार में हिंदी अनुवादक के पद पर मुंबई में कार्यरत रहे. मुंबई में ही उन्होंने थोड़े समय के लिए आकाशवाणी विविध भारती में आकस्मिक उद्घोषक के तौर पर भी कार्य किया. उनकी कविताएँ अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होनेके साथ-साथ आकाशवाणी से भी प्रसारित हुई हैं. उनकी एक काव्य-पुस्तिका "कुछ बातें कविताओं में", एक ग़ज़ल संग्रह “पत्थरों के शहर में”, तथा हिंदी से अंग्रेजी में अनूदित एक पुस्तक “द क्राउड बेअर्स विटनेस” अब तक प्रकाशित हुई है. डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लें आम आदमी की संवेदना को बख़ूबी अभिव्यक्त करती हैं. उनकी ग़ज़लों में आम-जन की पीड़ा एवं संघर्ष को सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है, इसलिए ये आज के इस दौर में भीड़ से बिलकुल अलग खड़ी नज़र आती हैं.

सम्पर्क:
डॉ. राकेश जोशी
असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला
देहरादून, उत्तराखंड
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ग़ज़लें
1.
बादल गरजे तो डरते हैं नए-पुराने सारे लोग। 
गाँव छोड़कर चले गए हैं कहाँ न जाने सारे लोग। 

खेत हमारे नहीं बिकेंगे औने-पौने दामों में,
मिलकर आए हैं पेड़ों को यही बताने सारे लोग। 

मैंने जब-जब कहा वफ़ा और प्यार है धरती पर अब भी,
नाम तुम्हारा लेकर आए मुझे चिढ़ाने सारे लोग। 

गाँव में इक दिन एक अँधेरा डरा रहा था जब सबको,
खूब उजाला लेकर पहुँचे उसे भगाने सारे लोग। 

भूखे बच्चे, भीख माँगते कचरा बीन रहे लेकिन,
नहीं निकलते इनका बचपन कभी बचाने सारे लोग। 

धरती पर खुद आग लगाकर भाग रहे जंगल-जंगल,
ढूँढ रहे हैं मंगल पर अब नए ठिकाने सारे लोग। 

इनको भीड़ बने रहने की आदत है, ये याद रखो,
अब आंदोलन में आए हैं समय बिताने सारे लोग। 

चिड़ियों के पंखों पर लिखकर आज कोई चिट्ठी भेजो, 
ऊब गए है वही पुराने सुनकर गाने सारे लोग। 

2.
जगमगाती शाम लेकर आ गया हूँ। 
मत डरो, पैग़ाम लेकर आ गया हूँ। 

हम सभी गद्दार हैं, हक़ माँगते हैं, 
सर पे ये इल्ज़ाम लेकर आ गया हूँ। 

फिर गरीबों को उदासी बाँटकर, 
मैं ज़रा आराम लेकर आ गया हूँ। 

सब यहाँ तलवार लेकर आ गए हैं, 
मैं तुम्हारा नाम लेकर आ गया हूँ। 

आत्मा तुमने बहुत सस्ते में बेची, 
मैं तो ऊँचे दाम लेकर आ गया हूँ। 

आज अपने साथ मैं रोटी नहीं, 
कुछ ज़रूरी काम लेकर आ गया हूँ। 

3. 
हर तरफ गहरी नदी है, क्या करें। 
तैरना आता नहीं है, क्या करें। 

ज़िंदगी, हम फिर से जीना चाहते हैं,
पर सड़क फिर खुद गई है, क्या करें। 

यूं तो सब कुछ है नए इस नगर में, 
पर तुम्हारा घर नहीं है, क्या करें। 

पेड़, मुझको याद आए तुम बहुत,
आग जंगल में लगी है, क्या करें।

लौटकर हम फिर शहर में आ गए,
फिर भी इसमें कुछ कमी है, क्या करें। 

तुमसे मिल पाया नहीं, बेबस हूँ मैं,
और बेबस ये सदी है, क्या करें। 

4.
हर तरफ भारी तबाही हो गई है,
ये ज़मीं फिर आततायी हो गई है।

कुछ नए क़ानून ऐसे बन गए हैं, 
आज भी उनकी कमाई हो गई है।

जब से हम पर्वत से मिलकर आ गए हैं,
ऊँट की तो जग-हँसाई हो गई है। 

फिर किसानों को कोई चिठ्ठी मिली है,
फिर से ये धरती पराई हो गई है। 

मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ,
बीच में गहरी-सी खाई हो गई है। 

वो तो बच्चों को पढ़ाना चाहता है,
पर बहुत महंगी पढ़ाई हो गई है। 

5.
कैसे-कैसे लोग शहर में रहते हैं। 
जलता है जब शहर तो घर में रहते हैं।

जाने क्यों इस धरती के इस हिस्से के,
अक्सर सारे लोग सफ़र में रहते हैं। 

भूख से मरते लोगों की इस दुनिया में,
राजा-रानी रोज़ ख़बर में रहते हैं। 

दौर नया है, जिसमें हम सबके सपने,
दबकर फाइल में, दफ्तर में रहते हैं। 

जनता जब मिलकर चलती है सड़कों पर,
दरबारों में लोग फ़िकर में रहते हैं। 

वो जो इक दिन इस दुनिया को बदलेंगे,
मेरी बस्ती, गाँव, नगर में रहते हैं।



गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

संस्मरण- केदारनाथ सिंह : बार-बार (लेखक- दिविक रमेश)

सुप्रतिष्ठित वरिष्ठ कवि, बाल-साहित्यकार, अनुवादक एवं चिन्तक दिविक रमेश
20वीं शताब्दी के आठवें दशक में अपने पहले ही कविता-संग्रह ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित हिन्दी-कवि बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। 38 वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच’ और ‘खुली आंखों में आकाश’ जैसी अपनी मौलिक साहित्यिक कृतियों पर सोवियत लैंड नेहरू एवार्ड जैसा अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले ये पहले कवि हैं। 17-18 वर्षों तक दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों का संचालन किया। 1994 से 1997 में भारत सरकार की ओर से दक्षिण कोरिया में अतिथि आचार्य के रूप में भेजे गए जहां इन्होंने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कितने ही कीर्तिमान स्थापित किए।
प्रमुख पुरस्कार/सम्मान: (1) दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यिक कृति पुरस्कार, 1983 (2) सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, 1984 (3)गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, 1997 (4) एनसीईआरटी का राष्ट्रीय बाल-साहित्य पुरस्कार, 1988 (5)दिल्ली हिंदी अकादमी का बाल-साहित्य पुरस्कार, 1990 (6)अखिल भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर का सम्मान, 1991 (7) राष्ट्रीय नेहरू बाल साहित्य अवार्ड, बालकन-जी-बारी इंटरनेशनल, 1992 (8)इंडो- एशियन लिटरेरी क्लब, नई दिल्ली का सम्मान, 1995, (9) प्रकाशवीर शास्त्री सम्मान, 2002  (10)कोरियाई दूतावास से प्रशंसा-पत्र, 2001 (11)भारतीय विद्या संस्थान, ट्रिनिडाड एंड टोबेगो द्वारा गौरव सम्मान, 2002  (12)दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, 2003 (13)शासी निकाय एवं स्टाफ काउंसिल, मोतीलाल नेहरू कालेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) द्वारा भाषा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया, 2003 (14)इंस्टीट्यूट ऒफ इकोनॉमिक स्टडीज द्वारा शिक्षा रत्न अवार्ड, 2004, अनुवाद के लिए भारतीय अनुवाद परिषद का द्विवागीश पुरस्कार (2009), भारतीय स्तर का श्रीमती रतन शर्मा बाल-साहित्य पुरस्कार, 2009(101 बाल कविताओं पर), उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (उत्तर प्रदेश सरकार ) का सर्वोच्च बाल साहित्य पुरस्कार - साहित्य भारती सम्मान (2013)।
प्रकाशित कृतियां: (1) कविताः ‘रास्ते के बीच’, 1977 और  2003 , ‘खुली आंखों में आकाश’, 1983, 1987, 1989 ‘हल्दी-चावल और अन्य कविताएं’, 1992 ‘छोटा-सा हस्तक्षेप’,2000  ‘फूल तब भी खिला होता’(खुली आँखों  में आकाश और हल्दी कावल और अन्य कविताएँ की कविताएं) , 2004 ‘गेहूँ घर आया है’ (चुनी हुई कविताएँ),2009,  वह भी आदमी तो होता हॆ, 2010, बाँचो लिखी इबारत,2012,  माँ गाँव में है, 2015 । (कविता-संग्रह)। ‘खण्ड-खण्ड अग्नि’ (काव्य-नाटक),1994 । ‘फेदर’ (अंग्रेजी में अनूदित कविताएं),1983, 1994। ‘से दल अइ ग्योल होन’ (कोरियाई भाषा में अनूदित कविताएं), 1997 । ‘अष्टावक्र’ (मराठी में अनूदित कविताएं), 1988 ।
आलोचना:(1) ‘कविता के बीच से’, किताबघर, नई दिल्ली,1992  (2)‘नए कवियों के काव्य-शिल्प सिद्धांत’, अभिरूचि प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली, 1991  (3)‘साक्षात् त्रिलोचन’, सिद्धार्थ प्रकाशन, नई दिल्ली,1990 (4)‘संवाद भी विवाद भी’, ग्रंथलोक, शाहदरा, दिल्ली,2008, समझा  परखा , किताबवाले , दरियागंज, नई दिल्ली, 2015, हिन्दी का बाल-साहित्य: कुछ पड़ाव , प्रकाशन विभाग, (भारत सरकार), नई दिल्ली,2015 ।
बाल साहित्य: कविता संग्रह : जोकर मुझे बना दो जी, 1980, हंसे जानवर हो हो हो, 1987, कबूतरों की रेल,1988,  छतरी से गपशप,1989,  अगर खेलता हाथी होली,2004 , तस्वीर और मुन्ना, 1997, मधुर गीत भाग-3 और भाग-4,1999,  अगर पेड़ भी चलते होते,2003,  खुशी लौटाते हैं त्योहार,2003,मेघ हंसेंगे जोर-जोर से, 2003 , 101 बाल कविताएं (2008), 2012 , खूब जोर से बारिश आई (2009) , समझदार हाथी: समझदार चींटी, 2014,2015,बंदर मामा, 2014, 2015, छुट्कल- मुट्कल बाल कविताएं, 2016  । कहानी  संग्रह :धूर्त साधु और किसान,1984,  सबसे बड़ा दानी, 1992,  शेर की पीठ पर, 2003, बादलों के दरवाजे,2003,  घमंड की हार,2003,  ओह पापा, 2003, बोलती डिबिया,2003 (ग्रंथलोक) ,बोलती डिबिया, 2010 (नेशनल बुक ट्र्स्ट ),  ज्ञान परी, 2003, बादलों के दरवाजे,2003, गोपाल भांड के किस्से, 2008, त से तेनाली राम ब से बीरबल, 2007, देशभक्त डाकू, 2011, लू लू की सनक, 2014 , अपने भीतर झांको, 2014 बचपन की शरारत ( सम्पूर्ण बाल-गद्य रचनाएं, 2016), मेरे मन की बाल कहाँनियाँ (2016), स्टोरीज फॉर चिल्ड्रन, 1996 ।
लोक कथाएं : सच्चा दोस्त, अभिरूचि प्रकाशन, दिल्ली ,1996, और पेड़ गूंगे हो गए (विश्व की लोक कथाएं), 1992, जादुई बांसुरी और अन्य कोरियाई कथाएं, 2009 , कोरियाई लोक-कथाएं, पीताम्बर पब्लिकेशन, दिल्ली, 2000, 2012 । 
आत्मीय संस्मरण : फूल भी और फल भी (लेखकों से संबद्ध),1994,  लू लू की सनक (कहानी संग्रह), 2014,  बचपन की शरारत ( सम्पूर्ण बाल-गद्य रचनाएं, 2016), मेरे मन की बाल कहाँनियाँ (2016)। 
बाल नाटक :  ‘बल्लू हाथी का बाल घर’,  2012)।
अन्य:‘खंड-खंड अग्नि’ के मराठी, गुजराती, कन्नड़  और अंग्रेजी अनुवाद। अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में रचनाएं अनूदित हो चुकी हैं। रचनाएं पाठ्यक्रमों में निर्धारित।
अनुवाद :(1) कोरियाई कविता-यात्रा (कोरियाई कविताएं), साहित्य अकादमी, दिल्ली , 1999 (2)(टिमोथी वांगुसा की कविताएं) सुनो अफ्रीका, साहित्य अकादमी, दिल्ली,   (3)कोरियाई बाल कविताएं, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली,2001  (4)द डे ब्रेक्स ओ इंडिया (श्रीमती किम यांग शिक की कविताओं का हिंदी अनुवाद), अजंता बुक्स इंटरनेशनल, दिल्ली, 1999  (5)  ख़लनायक ( यी मुन योल का कोरियाई उपन्यास), राजकमल प्रकाशन प्रा0 लिमिटेड,2015।
उपर्युक्त के अतिरिक्त बल्गारियाई, रूसी, चीनी आदि भाषाओं के साहित्य का समय-समय पर अनुवाद और उनका प्रकाशन।
संपादित :(1) निषेध के बाद (आठवें दशक की कविता), विक्रांत प्रेस, दिल्ली, 1981  (2)हिंदी कहानी का समकालीन परिवेश, 1980 और 2006, ग्रंथलोक, शाहदरा, दिल्ली  (3)आन्साम्बल (कविताएं एवं रेखा चित्र), विक्रांत प्रेस, दिल्ली,1992  (4)कथा पड़ाव, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1991 (5)दूसरा दिविक (कविता), 1973, विक्रांत प्रेस, नई दिल्ली (6)दिशा बोध( पत्रिका), विक्रांत प्रेस, दिल्ली, 1978, 1980 (7)बहरहाल,सौजन्य संपादक, 1981,  चंडीगढ़, व्यंग्य एक और एक , 1975, दूसरा दिविक, 1973।बालकृष्ण भट्ट, वाणी प्रकाशन, 2009, प्रताप नारायण मिश्र, वाणी प्रकाशन, 2012, माँ गाँव में है (कविता संग्रह), यश पब्लिकेशंस, 1/11848, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032, समझा परखा(आलोचना), किताबवाले,22/4735 प्रकाश दीप बिल्डिंग, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, खलनायक (कोरियाई उपन्यास काअनुवाद), राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग,दिल्ली।  

संपर्क :    बी-295, सेक्टर 20, नोएडा-201301 (यू.पी.) भारत।
फोन:    91-120-4216586,  9910177099, ई-मेलः divikramesh34@gmail.com
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केदारनाथ सिंह : बार-बार
     -दिविक रमेश

दिल्ली में होने के कारण कवि केदारनाथ सिंह को जानने-समझने का बार-बार अवसर मिला है। उनके मिलने पर हुए अनुभवों को कभी -कभार डायरी में लिखित रूप में उतारा है। उतारा इसलिए कि बाद में असल में नकल का तड़का न लग जाए। जब जॆसा महसूस किया, वॆसा लिख दिया। यूं मैं डायरी नियमित रूप से नहीं लिखता। अपने अनुभव से इतना अवश्य कह सकता हूं कि एक व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक ’सामान्य’ रूप खोजा जा सकता है लेकिन एक व्यक्ति के व्यक्तित्व का अनुभव हमेशा एक जॆसा ही हो यह जरूरी नहीं। मेरे संदर्भ में केदार जी भी एकदम अपवाद नहीं हैं। यहां मैं  डायरी के पन्नों से कुक सामग्री ज्यों क्या त्यों उतारने जा रहा हूं ताकि मुझसे होते हुए उनके व्यक्तित्व की कुछ सच्ची-कच्ची झलक मिल सके। हाँ, उनके साथ ही कुछ अन्य महानुभावों के भी दर्शन हो जाएं तो कृपया अन्यथा न लीजिए। यूं समझ लीजिए कि उनके बीच से भी केदार जी के व्यक्तित्व क कोई न कोई आयाम उभरा ही। यह भी बता दूं कि उन दिनों मैं शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और नागार्जुन की कविताओं में डूबा हुआ था और  अज्ञेय के मोहजाल से भरसक निकलने का प्रयत्न कर रहा था। केदारनाथ सिंह की कविताओं के बारे में त्रिलोचन जी से बातें होती थीं लेकिन ’जमीन पक रही है’ की कविताओं से अभी बहुत प्रभावित नहीं हो सका था-शायद अपनी तात्कालिक रुचि और  तॆयारी के चलते। थोड़ा रुक कर बता दूं कि जब 1983 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित केदार जी का संग्रह ’यहां से देखो’ पढ़ा तो वे मेरे रुचि के कवियों में सम्मिलित हो गए। इसी संग्रह की एक कविता ’पृथ्वी रहेगी’ मेरी निगाह में आज तक की एक उत्कृष्ट कविता है। इसके बारे में मैं ने "कवि केदारनाथ सिंह: (सं० भारत यायावर, राजा खुगशाल) नामक पुस्तक में लिखा था-"मेरे इने-गिने प्रिय कवियों में से एक हैं -केदारनाथ सिंह।  केदारजी की किसी एक कविता का जब भी मुझे ललक के साथ ध्यान आता है तो वह होती है -‘पृथ्वी रहेगी’। हर बार। ‘पृथ्वी रहेगी’ को मैं ने बर-बार पढ़ा है  और  हर बार मानों संवेदना की एक नई फड़फड़ाहट से भर गई है  काया और  आत्मा...।’ सोचता हूं कि कवि को इस कृति पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार क्यों नहीं मिल सका? मुझे जाने क्यों लगता रहा है  कि ’अकाल में सारस’ से बेहतर ’यहां से देखो है’। यहां मैं  अपनी डायरी, दिनांक 22-4-1990 का सहारा लेना चाहूंगा जिसमें केदार जी का एक बहुत ही घरेलू या कहूं आत्मीय रूप भी उभर कर आता है और  उनके कविता-संग्रहों की चर्चा भी जिसमें केदार जी का एक बहुत ही घरेलू या कहूं आत्मीय रूप भी उभर कर आता है  लिखा है --"अपने इस घर (बी-295, सॆक्टर-20, नोएडा) में, डॉ. श्रीमती निर्मला जॆन, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. केदारनाथ सिंह, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी और  डॉ. नित्यानन्द तिवारी को बुलाने की इच्छा काफी वर्षों से थी। 1986  में हम अपने इस नए घर  में आ गए थे। इस बीच  बुलाए जाने की बात कई बार चली लेकिन किसी न किसी कारण योजना सफल न हो सकी। मन में कितनी ही बातें थीं।.........केदार जी ने इधर मेरे तीसरे संग्रह के लिए कविताएं चुनी थीं। वे मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं। खॆर, 22-4-90 का दिन आ ही गया।...शाम बहुत ही खूबसूरत बन गई और  हमार घर तो गॊरान्वित हो उठा--शायद असहज भी-सहज होने की कोशिश में। ...बातों-बातों में पता चला कि सम्भवत: 1966 के आसपास सुरेश अवस्थी के यहां नामवर जी ने शराब चखी थी। दुनिया भर की बातें हुईं। खाना खाने के बाद प्रस्थान का समय आ गया। (सब) गेट से बाहर आ गए थे। निर्मला जी, द्विवेदी जी (कमलाकांत द्विवेदी) की गाड़ी में बॆठ चुकी थीं और  कदाचित नामवर जी भी। तभी केदार जी ने कहा -घर पूरा तो देख लिया जाए। मैं  संकोचवश इस बारे में कुछ नहीं कह सका था। मुझे केदार जी की इच्छा बहुत ही प्रीतिकर लगी। द्विवेदी जी पहले ही घर देख चुके थे--जब वे पहली बार आए थे। केदार जी जब मेरी बेटी दिशा के कमरे में गए तो वहां उन्होंने उसका एक खिलॊना ’टेडी बीयर’ देखा। बहुत ही स्नेह से उन्होंने उसे छूआ। मुझे बहुत ही अच्छा लगा। अद्भुत हृदय था--एक बड़े कवि का बड़ा व्यवहार। द्विवेदी जी ने बच्चों को विशेषरूप से बुलवाया और  उनसे विदा ली। हॉ., बातचीत में मेंने कहा था कि "अकाल में सारस" और ’यहां से देखों’ में कॊन सी कृति उत्तम है, इस पर विवाद है। नामवर जी इस पर कहा था कि दोनों एक ही कवि की रचना हैं और किसी भी कवि के लिए यह जरूरी नहीं होता कि वह एक जॆसी रचना ही करता रहे।’ सोचता हूं, केदार जी की कृतियों के बारे में जिस ‘कहन’ में नामवर जी ने बात रखी थी उससे केदार जी प्रति नामवर जी का भाव भी प्रकट हुआ और उनका अपना अन्दाज भी। यही, साहित्य अकादमी पुरस्कार से जुड़ा वह संदर्भ भी याद हो आया है  जिसने केदार जी को बहुतों की निगाह में पुरस्कार की औकात से भी ऊंचा उठा दिया था। पुरस्कार की घोषण के बाद केदार जी ने अपने की बात व्यक्त की थी कि उनसे पहले श्री गिरिजा कुमार माथुर को पुरस्कृत किया जाना चाहिए था। डायरी के पन्ने उलटता-पुलटता हू तो एक और खास पन्ना सामने आ गया है।       
"रविवार (15-3-1982)। सुबह दस बजे के लगभग केदारनाथ सिंह के घर पर पहुंच गया हूं। जे.एन.यू. का पूर्वांचल, (जहां उनका घर था), बहुत ही रमणीक इलाके में है। चाय-वाय आ गई। कुछ बातें शुरु हुईं। केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, नागार्जुन और शमशेर पर बातें शुरु हो गई थीं। त्रिलोचन जी से ली गई (मेरी एक बहुत लंबी) भेंटवार्ता जो जनयुग में छपी थी, उसकी एक प्रति केदार जी को देनी थी। केदार जी के अनुसार नागार्जुन अपनी और दूसरों की कविताओं में अच्छे-बुरे का विवेक रखने में, सब से आगे हैं। उसके बाद त्रिलोचन हैं। उनकी निगाह में ये सभी कवि ’मेजर’ कवि हैं। (लेकिन) केदारनाथ अग्रवाल के बारे में उनकी मान्यता थी कि उनकी कविताओं के चयन की आवश्यकता है। उनके अनुसार ’हे मेरी तुम’ में से केवल पाँच कविताएं ही लेने लायक हैं। "मुझे उनका वह खरा -सा रूप अच्छा लगा था। मेरा तो मानना था कि चयन की आवश्यकता तो नागार्जुन की कविताओं को भी है।
प्रसंग बदला। जीवन के बारे में बातें शुरु हुईं। "केदार जी ने पूछा कि तुम्हारा (मेरा) अगला कविता-संग्रह कब तक आ रहा है ? अब आ जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि आवेग  में छपी (मेर) ’पंख कविता उन्हें बहुत ही पसन्द आयी है । उसे देखकर उन्होंने सोचा था कि अब दूसरा संकलन आना चाहिए।" केदार जी मेरे प्रति वह सरोकार किताना आत्मीय था और  अविस्मरणीय भी, इसे अलग से कहने की जरूरत तो नहीं है न?
याद तो मुझे 14.3.82 वाला पन्ना भी याद हो पाया है । इसी दिन मैं  नामवर जी के घर गया था --लगभग सुबह के 11 बजे। पता चला था कि उन्हें चोट लगी थी। दरवाजे में घुसते-घुसते ही केदारनाथ सिंह जी भी मिल गए थे। उस दिन जनवादी मंच और भॆरवप्रसाद गुप्त के बारे में बातें हुई। नामवर जी के पास हमेशा फस्टहैं ड समाचार रहे हैं, यह मैं ने जाना। उनका आनन्द लेऊ और  दिलाऊ लहजा भी बहुत आकर्षक था। विस्तार से फिर कभी। मैं ने पाया कि केदार जी विवादित बातों में अपनी ओर से कुछ कहने की दृष्टि से न के बराबर शरीक हुए थे। वहां से सफदरजंग एन्क्लेव तक केदार जी मेरे साथ मेरे (दो पहिया) स्कूटर पर बॆठ कर आए थे। उन्हें  एक काम के सिलसिले में साहित्य अकादमी पहुंचना था। अगले दिन उनके घर पर मिलना भी तय हो गया था।
विवादों से परे रहने की उनके स्वभाव की एक और  घटना याद आ रही है। बात काफी पहले की है। इंदॊर में प्रगतिशिल लेखक संघ की ओर से इन्दॊर में "त्रिलोचन महत्त्व" का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। मैं  भी आंमंत्रित था। पहले भोपाल चाना था और वहीं से इंदॊर। केदारनाथ सींह को भी कार्यक्रम में शरीक होना था। हम दोनॊं ही भोपाल में थे --भगवत रावत के घर पर। उन दिनों अशोक वाजपेयी भोपाल में ही अधिकारी थे। केदार जी उनसे मिलने उनके कार्यालय गए तो मुझे भी साथ ले गए। थोड़ी देर बात हम अशोक जी के कार्यालय स्थित उनके कमरे में उनकी मेज के समीप उनके सामने बॆठे थे। मुझे इतना भर याद आ रहा है कि अशोक जी के चेहरे पर क्रोध उमड़ रहा था और  हाथ में पकड़ा पेपरवेट घूम रहा था। असल में उन्हें इंदौर कार्यक्रम मे सम्मिलित होने का निमंत्रण नहीं मिला था। अशोक जी को प्रगतिशील लेखक संघ, मध्य प्रदेश के आयोजकों में से कृत्घनता की बू आ रही थी। मैं तो क्या बोलता --यूं भी उस समय न अशोक जी मुझे कुछ मानते थे और न ही (मेरी समझ में) मुझे जानते थे। केदार जी के चेहरे पर छाया भाषागत आदि नियंत्रण और  शांत भाव अद्भुत था। एक मित्र से कॆसे मिला जाना चाहिए उसका एक अच्छा उदाहरण। मेंने केदार जी में, अनचाही स्थितियों में भी सहज रहने की कला के दर्शन कई बार किए हैं। एक बार तो अपने संदर्भ में भी। बात तब की है  जब हिन्दी अकादमी से उनके संपादन में कविता-संग्रह निकला था। हिन्दी अकादमी से मेरी कविताओं का संग्रह "खुली आँखों में आकाश" पुरस्कृत हो चुका था। मेरा तीसरा संग्रह "हल्दी-चावल और  अन्य कविताएं" प्रकाशित हो चुका था जिसकी कविताओं की विशिष्टता केदार जी लिख कर उजागर कर चुके थे। केदार जी ने अक्सर मुझे सार्वजनिक रूप से कई अवसरों पर अपना प्रिय कवि भी कहा है --आज तक। लेकिन उस समय मुझे लगभग आघात पहुंचा जब मैं ने हिन्दी अकादमी के संकलन में खुद को नदारद पाया। उस समय के सचिव से तो मुझे कुछ खास उम्मीद तो थी नहीं जो मुझे अहंकारी और  एक खेमे विशेष को प्रोमोटर अधिक लगते थे। यह सोचकर खुद को तसल्ली देनी चाही कि जरूर सचिव महोदय ने ही खुराफात की होगी।  लेकिन जब एक बार मैं ने केदार जी से ही किसी प्रसंग में, हिन्दी अकादमी से पुरस्कृत होने के बावजूद उस संकलन में अपनी कविताओं के न होने की बात रखी तो उन्होंने बहुत ही सहज ढ़ंग से अपना अचम्भा व्यक्त किया और एक कारण भी खोज निकाला यह कहते हुए कि चयन के काम में जे.एन.यू. के एक विद्यार्थी ने मदद की थी, उसी से भूल हो गई होगी। अब कोई क्या बोलता। यही तो केदारनाथ सिंह की केदारियत है -कदाचित।       
स्कूटर पर बॆठने वाली बात ने एक और  घटना की याद दिला दी है। मैं ने पी-एच.डी की उपाधि के लिए अपना कार्य नॊकरी लगने के काफी बाद किया था। कविता के क्षेत्र में में पहचाना तो जानेही लगा था। केदार जी से भी परिचय हो चुका था। उपाधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में मौखिकी (वायवाया) का आयोजन किया गया था। पता चला था कि परीक्षा के लिए केदारनाथ सिंह जी को हि आना है। जहां तक मुझे याद है, उस दिन केदारनाथ सिंह अमर कालोनी स्थित मेरे घर पर आ गए थे और  वहां से मेरे स्कूटर पर बॆठकर ही विश्वविद्यालय पहुंचे थे। उन्होंने ही नहीं मैं ने भी उन से परीक्षा को लेकर कोई बात नहीं की। हां इतना जरूर अनुरोध कर लिया था कि वे मेन गेट पर ही उतर जाएं ताकि किसी को यह न लगे कि परीक्षार्थी और  परीक्षक एक साथ आए हैं। लगभग ऎसी ही घटना तब घटी थी जब मैं  आई.सी.सी.आर के कार्यालय में साक्षात्कार देने गया था और  केदारजी साक्षातकार लेने वाली समिति के सदस्य थे। अंतर केवल इतना था कि तब मेरे पास एक पुरानी कार हो चुकी थी। उस अवसर पर भी केदार जी ने साक्षात्कार को छोड़ शेष बातें ही की थीं। उनका वह निष्पक्ष रूप मुझे बहुत ही प्रेरणादायी लगा था। मैं ने पाया है  कि केदार जी एक भावुक व्यक्ति हैं  जो सकारात्मक सोच में विश्वास रखते हैं। उनमें कभी अहंकार का भाव, कम से कम, मैं ने तो नहीं देखा। उनके साथ बहुत ही सहज भाव से रहा जा सकता है। उनकी सहजता कोलेकर एक और  किस्सा याद आया। उन दिनों मैं  दिल्ली विश्वविद्यालय के एक महाविद्यालय में प्राचार्य था।  एक दिन अचानक केदार नाथ सिंह जी मेरे कमरे में प्रकट हुए तो एक ओर आश्चर्य था तो दूसरी ओर अपार खुशी। उन्होंने बताया कि आपसे मिलने का मन हुआ तो इधर चला आया। उनकी सहजता से तो मैं  पहले ही परिचित था।  उस दिन अच्छी मुलाकात हुई। झटपट सम्मानित करने का मोह नहीं त्याग सकता था। सहयोगियों ने इसमें मेरी मदद की। उस दिन का एक फोटो हाथ आ गया है, लगा रहा हूं। 

अनेक अनुभव हैं। कितनी ही बार मेरे घर, उनके घर और  अन्य स्थानों पर मुलाकातें हुई हैं। मेरी पुस्तकों पर बोले हैं। संकेत दे चुका हूं कि मेरे तीसरे कविता-संग्रह "हल्दी-चावल और अन्य कविताएं" के लिए न केवल कविताओं का चयन किया था बल्कि एक अच्छी टिप्पणी भी लिखी थी। मेरी चुनी हुई कविताओं के संग्रह "गेहूं घर आया है" पर बोलते हुए उन्होंने जो कहा था जो रिपोर्ट के रूप में भी प्रकाशित है और  उसी से एक अंश यहां दे रहा हूं- "यह चेहरा-विहीन कवि नहीं है बल्कि भीड़ में भी पहचाना जाने वाला कवि है। यह संकलन परिपक्व कवि का परिपक्व संकलन है और इसमें कम से कम 15-20 ऐसी कविताएँ हैं जिनसे हिंदी कविता समृद्ध होती है। इनकी कविताओं का हरियाणवी रंग एकदम अपना और विशिष्ट है। शमशेर और त्रिलोचन पर लिखी कविताएँ विलक्षण हैं। दिविक रमेश मेरे आत्मीय और पसन्द के कवि हैं।’विशिष्ट अतिथि केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह को रेखांकित करने और याद करने योग्य माना। कविताओं की भाषा को महत्त्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने कहा कि दिविक ने कितने ही ऐसे शब्द हिंदी को दिए हैं जो हिंदी में पहली बार प्रयोग हुए हैं। उन्होंने अपनी बहुत ही प्रिय कविताओं में से ‘पंख’ और ‘पुण्य के काम आए’ का पाठ भी किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा कि वे किसी बात को दोहराना नहीं चाहते और उन्हें कवि केदारनाथ सिंह के विचार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे केदारनाथ सिंह के मत पर हस्ताक्षर करते हैं। उनके अनुसार एक कवि की दूसरे कवि को जो प्रशंसा मिली है उससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। "इस उद्धहरण को कृपया आत्मप्रशंसा के रूप में लेकर न देखा जाए( क्योंकि मुझे अपने बाअरे में कभी जरूरर से ज्यादा भ्रम नहीं रहा है ) बल्कि इस रूप में देखा जाए कि एक अगली पीढ़ी का अपने पीछे आने वाली पीढ़ी के प्रति कॆसा उत्साहवर्धक व्यवहार होना चाहिए। तभी इसकी सार्थकता है।

मैं त्रिलोचन जी के बहुत करीब रहा हूं। उन्होंने केदार जी से सीखने की सलाह, बराबर दी थी। अपने अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि कवि केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व से बहुत कुछ सीखा जा सकता है ।
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ये लेखक की अपनी संस्मरण रचना है, जिससे सहमत-असहमत हुआ जा सकता है। (संपादक-सर्वहारा)