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शनिवार, 5 नवंबर 2016

कविता

(1)
डॉ. दिग्विजय शर्मा "द्रोण"
क्यों संवेदना का ज्वर उतर गया,
क्यों मानव जीवन्त ही मर गया,
क्यों रोज़ होते हैं बच्चों के अपहरण,
क्यों रोज़ होते हैं कन्या भ्रूण के मरण,
क्यों यहाँ होते हैं हर रोज़ बलात्कार,
क्यों यहाँ होते हैं आतंकवाद के शिकार,
क्यों करते हैं धर्मों पर अपना अधिकार,
क्यों नहीं करती कुछ राजनीतिक सरकार,
क्यों करते हैं लोग इन सभी को दरकिनार। 

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(2)
बनना है तो किसी का हमसफ़र बन
कंगुरा मत बन नींव का पत्थर बन,
बून्द-बून्द भरके आधा घड़ा छलकेगा,
बनना है तो कोई मीठा समन्दर बन।

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(3)
मेघों ने भी सुन ली,
जन की आर्त पुकार!
धरती पर पड़ने लगी,
शीतल मन्द फुंहार!!
लता-लता प्रमुदित हुई,
गद्गगद दादुर मोर!
पावस आवत देखकर,
मन हो गया चकोर!!
धरती ने धारण किया,
हरा-हरा परिधान!                        
मेघ गगन में तानते,
दिखते फिरे वितान!!
मेघ घिरे हर ओर हैं,
गरज रहे घनघोर !
बरस-बरस कर भर रहे,
नदियों के दो छोर!!
तटिनी के तटबन्ध का,
है उन्मुक्त प्रवाह!
जलचर सब अब ले रहे,
उसमे अपनी थाह!!
कोयल कूके ,पिव रटे,
पिक नाचे उन्मुक्त !
पावस वाले गीत सब,
गाते हो संयुक्त !!
अब किसान ने खेत में ,
रोप दिया है धान!
जो अब तक रोता रहा,
छेड रहा है तान!!
बरसो सावन भाद्रपद,
से आश्विन तक मेघ !
तृप्त करो जन मन विरल,
बढते रहो सवेरा। 

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(4)
प्रश्नों का अम्बार लगा है,
हम सब चुप हैं, उत्तर चुप है,
कौन सहेजे इन काटों को,
बगिया चुप है माली चुप है
दिनकर चुप है निशिकर चुप है,
उठी बदरिया काली काली,
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है,
प्रश्नों का अम्बार लगा है,
हम सब चुप हैं, उत्तर चुप है।

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(5)

आपसे हम क्या मिले!
हमको सहारा मिल गया।
ज़िन्दगी की नाव को
सचमुच किनारा मिल गया।
सोचते थे ज़िन्दगी
बेनूर थी जीते रहे।
प्यार पाया आपका
जीवन दुबारा मिल गया।

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(6)
सरहद के शहीदों को
मेरा प्रणाम!
आँसू आ जाते हैं,
उनकी शहादत में
जो अपनी जान पर
खेल कर
हमको चैन की नीद
सुलाते है नौजवान!
अब न करो इन्तजार
सबक सीखा दो,
इन गद्दारों को
देश के पहरेदार!!!

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(7)
समन्दर मैं तुझसे
जब भी मिलने आउंगी,
अपने दरिया का पानी
जरूर साथ लाऊंगी,
शायद आप पीकर
जरूर सोचोगे,
हमसे आज नही तो कल
जरूर मीठा बोलोगे,
मुझे तो बस
दरिया के पास रहने दो,
तेरे पास रहकर
क्या लाभ मिल पायेगा?
तुम बस नाम भर के
तो समन्दर हो।

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(8)
मै बस देखना
चाहती हूँ,
अब भी उन आखों
में नाचती
थिरकती
रूह में
उतरती
पहले वाली
तुम्हारी वो
मासूम सी
इश्क भरी
आँखें,
जिसमे अपनों
की महक
वही दोस्ती
की आशा
कुछ इश्क
जैसी भाषा
वो मानवता
की सी खुशबू
वो बातों का
जज्बा,
वो बीते दिनों का
याराना
और बस
रहता था तो
बस इन्तजार!
वो चाहे
दिन हो या रात
बस करने के लिए
एक बात
चाहे न हो मुलाक़ात
बस वही
मैं देखना चाहती हूँ,
आज भी
तेरी आँखों में
वो कल जैसी
चमक
वो नशा
वो जूनून
जहाँ हों बस
मैं और तुम
बस जहाँ
कोई और नहीँ।
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रचनाकर- 
डॉ. दिग्विजय शर्मा "द्रोण"
आगरा (उ.प्र.)